अखियों के झरोखों से

–  संत राम बजाज

कुछ समय से आंखों को ले कर अजीब  सी परेशानी  चल रही थी  |

श्रीमती जी से बिना मतलब की तू तू मैं मैं हो रही थी |

” यह कौन सा वाशिंग पाउडर यूज़ कर रही हैं, कमीज़ें सब पीली पीली दिखाई पड़ रही हैं”|

”देखूं, अच्छी भली तो है, दूध की तरह स्पेद | लगता है आप की आंखों का पाउडर खराब हो गया है |मैं ने पहले भी आप से कहा था कि अपनी ऐनक का नंबर चेक करवा लें, पर आप किसी की सुनें तो!”

“क्या बात करती हो, मेरी आँखें 100% हैं, अभी 6 महीने पहले तो ऐनक का नंबर लिया था”

” हाँ, लिया तो था, पर भूल गए जो ओप्टोमेट्रिस्ट (optometrist) ने कहा था कि आँख में मोतिया (cataract) उतर रहा है”

“मोतिया वोतिया, कुछ नहीं – यह ऐसे ही लोगों को डराते रहते हैं”

कहने को तो हम ने पत्नी से कह दिया , पर चिंता लग गई कि मामला कुछ सीर्यस है |

श्रीमती जी की बात ठीक ही थी | इस से पहले कुछ घटनाएं हो रही थी ,जैसे गालीचे से ठोकर लगने पर कई बार गिरते गिरते बचे  | शावर के सक्रीन से कई बार टकराये, वह तो शुक्र है कि शीशा नहीं टूटा | घर में सीढ़ियों से उतरते समय आख़िर वाली सीढ़ी मिस कर गए और गिरते गिरते बचे|

एक बार पार्टी में  जाने के लिए तैयार हो कर कार में बैठने ही वाले थे कि श्रीमती जी ने टोका,” यह कौन सा फैशन है?”

“क्या हुआ?”

“जरा अपने जूतों को देखिये, दो अलग अलग जुराबों का तो सुना था मगर दो अलग अलग जूते, यह आज ही देख रही हूँ|

देखा तो, जूते थे एक ही रंग के,लेकिन दो अलग स्टाइल के| माथा पीट कर रह गए!

कुछ दिनों से टीवी पर पिक्चर भी साफ़ नहीं दिखती थी , हम सोच रहे थे ‘रिसेपशन’ की समस्या है| कंप्यूटर पर भी धुँधला धुँधला ही दिखाई पड़ रहा था |किताब पढ़्नी मुश्किल हो रही थी, दूर का देखना भी साफ़ नहीं था |

फिर उसी दिन बस स्टैंड पर खड़े थे और दूर से आती बस का नंबर पढ़ने में दिक्कत हो रही थी | पास खड़ी  एक औरत से पूछा ,” एक्स्यूज़ मी, मैडम ,यह कौन से नंबर की बस है”

”यू सिल्ली ओल्ड मैन, मै तुम्हें मैडम दिखाई देता हूँ “, यह एक मर्द की आवाज़ थी |

कई बार ‘सॉरी’ कह  कर जान  छुड़ाई|

बस,वह जो कहते हैं ना,ऊँट की कमर पर आखिरी तिंका | हम ने तुरंत फैसला कर लिया कि ‘आई सर्जन'(eye surgeon) के पास जायेंगे |

उस ने कहा कि आँखें ,दिल और दिमाग़ के बाद एक महत्वपूर्ण अंग हैं , इन का ध्यान रखना अति आवश्यक  है | Cataract है दोनों आँखों में- ऑपरेशन करवाना होगा, दोनों आँखों के लैंज़ बदल देंगे बस !”

”अच्छा वह लैंज़, जिसे लगाने से आँखें हरी या नीली भी लगने लगती हैं”

“नहीं, मै उन लैंज़ की बात नहीं कर रहा – यह लैंज़ तो आँख की पुतली के पीछे होते हैं और    रोशनी इन के द्वारा ‘रेटिना’ पर पड़ती है| ‘लैंज़’ पर स्क्रैच (खरोंचें) पड़ गई हैं, जो साफ़ नहीं की जा सकतीं | इस लिए उस लैंज़ को निकाल, उस के स्थान पर नया लैंज़ डाल देंगे|”

हम ऑपरेशन का नाम सुन कर घबराये,“अरे बाप रे! इतनी काट फाट और टाँके, क्या ड्रापस आदि से ठीक नहीं हो सकता?”

”नहीं, अरे भाई, तुम तो बेवजह ही डर रहे हो – मामूली सा 15/20 मिनट का ‘प्रोसीजर’     है, पता भी नहीं चलेगा- हम तो इसे ऑपरेशन कहते ही नहीं| केवल 3 मिलिमीटर का होल बनायेंगे,जो कुछ दिनों में अपने आप ही भर जायेगा | टाँके आदि कुछ भी नहीं  लगेंगे | इस लिए चिंता करने की जरूरत नहीं है ” डॉक्टर साहिब ने बड़े प्रेम से  समझाया , तब जा कर कुछ तसल्ली हुई |

“पहले एक आँख का करेंगे, फिर कुछ समय के बाद दूसरी का| हाँ कुछ दिन कार नहीं चला सकेंगे | कुछ सावधानी बरतनी होगी कुछ कामों में, जैसे सिर को नीचे झटके के साथ नहीं करना होगा, धूप में काला चश्मा लगाना होगा, बल्कि रात को भी यदि बहुत तेज़ रोशनी के सामने जाना पड़े तो | मतलब यह कि पहला हफ्ता जरा ज्यादा सावधान रहने का, उस के बाद क़रीब क़रीब सब नार्मल हो जायेगा|

सो डॉक्टर साहिब की  बात मान हम ने दाईं आँख का ऑपरेशन पहले कराया , क्योंकि वह ज्यादा कमजोर थी|

डॉक्टर की बात ठीक थी, पता भी नहीं चला,और एक घंटे में घर भी पहुँच गए |

थोड़ी बहुत असुविधा तो हुई | महीना भर के लिए आँख में दो तरह के ‘ड्राप्स’ डालने के लिए कहा गया | अब रात को काली ऐनक पहनना बड़ा अजीब लगा| ऐसा लगता था कि किसी से नजरें चुरा रहे हों या हिन्दी फिल्मों के स्मगलर या विलैन लगते हों|

पहले दिन दाईं आँख पर पट्टी बंधी हुई थी, बड़ा विचित्र महसूस हो रहा था | टी वी देखना मना था, पर जब नजर डाली भी, तो  एकदम उलटा -यानी पिक्चर ऐसी  लगी जैसे 3- डी  को 2- डी या 1- D में देख रहे हैं|

एक सप्ताह के बाद कुछ घूमने को निकले | घर के पास एक पार्क में एक चक्कर लगा कर हम तो एक बेंच पर बैठ गये , पर श्रीमती जी एक दो और चक्कर लगाने लगी | हमारे सामने फूलों की एक क्यारी थी, फूल बहुत ही ख़ूबसूरत लग रहे थे | दाईं आँख से देखने पर फूलों की रंगत में काफी निखार दिख रहा था ,जो बाईं आँख से देखने पर नहीं था | हम मुग्द से कभी एक आँख बंद करते तो कभी दूसरी बंद कर उन्हें निहारते रहे|

हम इतने मगन थे कि हम ने यह  नोट ही नहीं किया कि एक औरत हमें घूर घूर कर देख रही थी | परंतु अचानक  उस की गरजदार आवाज़ ने हमें चौंका दिया |

” तुम्हें शर्म नहीं आती?”

हम ने उस की ओर आँख उठा कर देखा और हड़बड़ा कर बोले,

” किस बात की?

“इस घटिया हरकत की,जो तुम बड़ी देर से कर रहे हो ”

”क्या  मतलब?

“तुम सामने बैठी लड़कियों को आँखें मार रहे थे”

”क्या बकवास कर रही हैं आप?

“अब तुम गाली गलोच पर भी उतर आए “, वह बोली |

“अरे माता जी! आप होश में तो हैं ? हमें भी ताव आ गया |

“माता जी! किस को बोला, माता जी? पहले अपनी आंखों का इलाज कराओ”

“वुही तो करवा रहा हूँ, और आप हैं कि बिना सिर पैर की बातें कर रही हैं”

“मैं अभी पुलिस को फ़ोन करती हूँ “, वह कुछ और बिगड़ गईं |

“हाँ हाँ, कर दो”

… इस से पहले कि बात आगे बढ़ती, हमारी श्रीमती जी अपना राउंड पूरा कर सीन पर पहुँच चुकी थीं और हालात को काबू में कर लिया था |

इस के बाद हम ने कई दिन से पार्क की शक्ल नहीं देखी , इस डर से कि फिर कोई ऐसा ही हादसा न हो जाए |

….. अब तब ही जायेगें जब दूसरी आँख का मामला भी फिट हो जायेगा |

मेरा मतलब है कि दोनों आँखों से बराबर बराबर दिखाई देने लगेगा |

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Posted by on Jan 9 2011. Filed under Hindi, Humour. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. Both comments and pings are currently closed.

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