जब हम ने कुत्ता पाला ….

 

 

संतराम बजाज

मुझे कुत्तों से सख्त़ नफ़रत है |

इस से पहले कि आप ईंट पत्थर उठा कर मुझे  मारने को दौड़ें, मेरी पूरी बात तो सुन लीजिए….

मेरा एक पड़ोसी है जिस के पास एक कुत्ता है जो भौंकता है |

आप कहेंगे “यह कौन सी ब्रेकिंग न्यूज़ सुना दी मैं ने ! अक्सर पड़ोसियों के पास कुत्ते होते हैं और कुत्ते भौंकते तो हैं ही |”

सो तो ठीक है ,पर यह कुत्ता किश्तों में भौंकता है |

मतलब मैं समझाता हूँ ..रात को अचानक यह एक भौंक लगाता है और फिर एकदम चुप हो जाता है, जैसे उसे याद आ जाता हो कि कई शरीफ़ लोग सो रहे होंगे उन्हें क्यों डिस्टर्ब किया जाए, पर थोड़ी देर के बाद वह यह भूल जाता है और फिर दूसरी भौंक,(जो पहली की दूसरी किश्त होती है) शुरू कर देता है|

और यह सिलसिला रात को कई बार दुहराता है |

हम इस की इस आदत से बहुत दुखी हैं और अक्सर उसे बददुआ देते रहते हैं पर उस पर इस का कोई असर नहीं पड़ता|

कुत्ता वैसे बड़ा ‘कंट्रोवर्सीयल’ जीव है| एक तरफ तो इसे आदमी का सब से अच्छा साथी माना गया है तो दूसरी ओर घृणा का पात्र समझा जाता है ,जैसे  किसी को बहुत ही बुरा कहना हो तो उसे ‘कुत्ता कमीना’ कहा जाता है|

कुत्ते या तो धोबी रखा करते थे या भेड़ बकरी पालने वाले चरवाहे |

आज कल की तरह कुत्ते घरों में पालने का रिवाज नहीं था क्योंकि गली मुहल्लों में जितने चाहो देख लो और वे आम तौर पर इंसानों के साथ कोएग्जिस्टेंस(coexistence) की पालिसी पर चलते थे ,यानी आप खाना खा रहे हैं तो वे चारपाई के पास बैठ इंतज़ार करते थे कि कब आप खाना खा कर उन्हें कुछ देंगे , छीना झपटी नहीं करते थे|लड़ाई झगड़े करते थे तो आपस में, आम तौर पर इंसानों को कुछ नहीं कहते थे , हाँ भौंकते ज़रूर थे या कभी कभार काट लिया, पर वह भी तब जब किसी ने शरारत की या कोई चोर उचक्का मुहल्ले में आ घुसे | एक तरह से सिक्योरिटी गार्ड का काम करते थे |

बड़ा अच्छा अरेंजमेंट था ..

लेकिन फिर न जाने कब वे घर के अंदर घुस आये, सोफे पर,बेड रूम में,बिस्तर में और गोद में| तभी से सब गडबड होने लगी ….

हर घर में कुत्ता ,परिवार का एक सदस्य बन गया है |

अब हालत यह है कि यदि आप ने कुत्ता नहीं पाल रखा तो आप ‘पिछड़ी जाती’ के यानी बैकवर्ड लगते हैं|

क्योंकि  बड़े बड़े लोग, राजे महाराजे, वीआईपी .. इंगलैंड की महरानी, अमेरिका के प्रेज़िडेंट.. सभी तो कुत्ते रखते हैं |

अब ऐसे में कुत्तों के नखरे भी बढ़ने लगे हैं |

अपने और अपने बच्चों से ज़्यादा अपने कुत्ते का ध्यान रखना पड़ता है |

हर महीने शैम्पू और ‘हाईडरो’ बाथ देने घर ‘मोबाईल गाड़ी’ आती है| दो हफ्तों में एक बार कुत्ते को ‘ग्रुप थर्पी’ के लिए भेजा जाता है , जिस में वह दूसरे कुत्तों से मिल सके ताकि उस का अकेलापन दूर हो और उस पर कोई बुरा साईक्लोजिकल (psychological) असर न पड़े| वहाँ पर कुत्तों को अलग अलग श्रेणियों में रखा जाता है| जवान और ताकतवर या तेज़ दौड़ने वाले कुत्तों को खेलों की प्रेक्टिस कराई जाती है जबकि सीनियर कुत्तों के लिए अलग से प्रोग्राम होते हैं, जिस में ज़्यादा दौड़-धूप नहीं करनी पड़ती|

अब कुछ हद तक तो ठीक है पर कुछ लोग तो कुत्ते को अपने ही बिस्तर पर सुलायेंगे और उसे चूमे चाटेंगे | अब यदि आपकी बीवी कुत्ते को किस (kiss) करने के बाद आप को किस करे तो कैसा लगेगा?

सारे घर में उन के बाल बिखरे मिलेंगे यहाँ तक कि किचन में भी | मुझे तो मतली सी आने लगती है ऐसा देख कर ही|

यहाँ आस्ट्रेलिया में ८०००० लोगों  में हुए एक सर्वे में यह पाया गया है कि  ८० % औरतें अपने पति से ज्यादा अपने कुत्ते पर खर्चा करती हैं, जबकि ६३%  आदमी ऐसा कुछ कर पाते हैं| है ना मर्दों की हार!

और तो और, ७७% औरतें, इस बात को मानती हैं कि वे अपने पति और बच्चों की निस्बत कुत्तों की देख रेख में ज़्यादा ध्यान देती हैं|

यह बात सत्य है कि कुत्ते बड़े मुफीद (अच्छे) काम भी करते हैं जैसे ‘गाईड डॉग’- जो कमज़ोर आँख के लोगों की सहायता करते हैं , पुलिस और कस्टम विभाग में चोरों को पकड़ने में काम आते हैं| दुर्घटना स्थल पर मलबे में फंसे लोगों को ढूँढने में सहायक होते हैं|

हाँ कुछ बुज़ुर्ग लोगों को अपना अकेलापन दूर करने के लिए भी कुत्तों की आवश्कता पड़ सकती है ..

मुझे इस पर कोई आपत्ति नहीं है|

ऐसे कुत्ते तो बेचारे हम आम इंसानों की तरह है जो दिन रात मेहनत मजदूरी करके अपना पेट पालते हैं और बिगड़े रईसों की तरह नहीं हैं |

खैर साहिब बात मेरे पड़ोसी के कुत्ते से शुरू हुई थी….

उस ने मेरी नींद हराम कर रखी थी सो हम ने सोचा कि क्यों न हम भी एक कुत्ता रख लें.. वह जो कहते हैं ना कि कुत्ता कुत्ते का बैरी होता है..पड़ोसी को और उस के कुत्ते को सबक तो सिखाना  होगा!

और हम ले आये एक तगड़ा सा ‘जर्मन शैपर्ड’- जो कि हमारे पड़ोसी ‘लैब्राडोर’ को मात दे सके|

कितने का, मैं नहीं  बताऊंगा, आप विश्वास नहीं करेंगे कि कुत्ते इतने महंगे भी हो सकते हैं| बात हज़ारों की है| उस का नाम  भी धाँसू था – ‘टाईगर’| खरीदते समय, हमें सब कुछ समझा दिया गया कि उस का ध्यान कैसे रखना है – कब उसे Vet के पास ले जाना है, कब नहलाना है,कब उसकी ग्रूमिंग होगी यानी कब उस के बाल, नाख़ून आदि कटेगें और कब उसकी socialising  होगी अर्थात कब  उसे दूसरे कुत्तों के साथ मिलाने ले जाना होगा| इस के अतिरिक्त सैर पर प्रतिदिन ले जाना  होगा| यदि स्वयं नहीं करा सकते तो ३० डॉलर घंटे पर उन का ट्रेनर आकर उसे सैर करा सकता है|

शेष सब सेवाओं का भी उचित दामों पर प्रबंध किया जा सकता था|

हम इतनी लम्बी लिस्ट सुन कर घबरा तो गए परन्तु पड़ोसी के कुत्ते की याद आते सब्र का घूँट पी गए और कुत्ते, सॉरी ‘टाईगर’ को घर ले आये|

आते ही उस का गृह -प्रवेश उस के ‘डौगी हाऊस’में किया, जिस में उस का स्पेशल बैड लगाया गया था| नया कॉलर,कुछ खेलने के लिए गेंद और उस के भोजन के लिए स्पेशल और बैलेंस्ड (balanced) डॉग फ़ूड का प्रबंध किया| टाईगर  नए घर में थोड़ा नर्वस (nervous)दिख रहा था, इसलिए उसे कुछ देर के लिए आराम करने दिया|

शाम होते ही ‘टाईगर’ को सैर कराने के लिए निकले|

जूंही पार्क में घुसे कि उसे ‘काल आफ़ नेचर’ की हाजत हुई और हम इधर उधर झाँकने लगे कि कोई देख तो नहीं रहा ताकि चुपके से खिसक लें, परन्तु काफी लोग थे, इसलिए पलास्टिक बैग में समेटना पड़ा| बड़ी तकलीफ हुई क्योंकि हम ने ज़िन्दगी में कभी अपने बच्चों की नैपी तक नहीं बदली थी और अब यह सब करना पड़ रहा था|

‘टाईगर’ जी अब चुस्ती से चल रहे थे और सामने की छोटी सी पहाड़ी तक पहुंच गए| हमें थकावट सी महसूस हो रही थी| सोचा थोड़ा दम ले लें |पर अभी हम ठीक तरह से संभल भी नहीं पाए थे कि हम ने देखा कि ‘टाईगर’ कुछ उतावला होने लगा है और फिर उस ने भौंकना शुरू कर दिया|

कारण भी समझ में आ गया| थोड़ी दूरी पर एक और कुत्ता अपने मालिक के साथ जा रहा था और यह उस के साथ शायद शक्ति प्रदर्शन करना चाहता था| हम उसे अपनी ओर खींचते और वह हमें अपनी ओर| दूसरी ओर वाले कुत्ते ने भी इसे ‘प्रेस्टीज इशु’(prestige issue) बना लिया था और जवाबी भौंकना शुरू कर दिया था |

यह चैलेन्ज था ‘टाईगर’ के लिए और उस ने उधर दौड़ना शुरू किया और हमें साथ घसीटने लगा| हम दोनों में काफ़ी रस्साकशी हुई किन्तु हमारी दो टांगें उस चार टांगों वाले का भला कहाँ तक  मुक़ाबला करतीं?

ढलान की वजह से हम ऐसे फिसले कि उस की ‘लीश’ भी हमारे हाथ से निकल गई और हम  ज़ोर से जा टकराए एक पेड़ से|

उस के बाद हमे कुछ याद नहीं,  होश आया तो अपने आप को अस्पताल के बिस्तर पे पाया| डॉक्टर ने बताया कि हमारी कॉलर-बोन में  क्रैक आया था  और हमारी कोहनियाँ और घुटने बुरी तरह से छिल चुके थे, इसलिए ६ से ८ सप्ताह तक हमें बिस्तर पर आराम करना पड़ा| उस के बाद भी कई दिन तक सीधे नहीं चल पाये|

….अब तो आप समझ ही चुके होंगे कि मुझे कुत्तों से नफ़रत क्यों है|

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Posted by on Jul 15 2011. Filed under Hindi, Humour. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. Both comments and pings are currently closed.

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