मानक की मामी


एक मनोवैज्ञानिक कहानी    … संत राम बजाज

 

”अजी सुनते हो, मानक की मामी किसी के साथ भाग गई”,  मिसेज़ सेठी बड़े ऊंचे और उतावले स्वर में अपने पति को ही नहीं शायद हर उस को जो भी उन के घर की रेंज में था, यह खबर सुना रही थी। मिसेज़ सेठी गली के कार्नर वाले मकान में रह्ती हैं और महल्ले में हर आने जाने वाले पर नज़र रखती हैं और इधर उधर की सब बातों का ब्योरा उन के पास होता है। जैसे, किस के घर में कौन आता है, किस की बेटी का किस लड़के से चक्कर चल रहा है या फिर किस मियाँ बीवी का झगड़ा चल रहा है आदि आदि।
सेठी साहिब, जो एक ऑफिस में काम करते हैं, अपनी बीवी की इस ताक झाँक की आदतों से काफी परेशान हो जाते हैं, पर कहते कुछ नहीं क्योंकि फिर उन्हें ही अपनी पत्नी के गुस्से का शिकार होना पड़ता है। उन्हें भी अचंभा हुआ, ” क्या कह रही हो?  वह ऐसी औरत नहीं थी”
”आप को कैसे मालूम  कैसी औरत थी,  मैं सब जानती हूँ। मुहल्ले के सब मर्दो पर उस की नज़रें थी। आप भी तो खिड़की मे खड़े उसे ताका करते थे।”
”तुम्हें तो वहम की बीमारी है और दूसरों के फट्टे में टाँग अड़ाने में तुम्हें मज़ा आता है, जो बिना सोचे समझे बोलती रहती हो।”
मानक की मामी का असल नाम बहुत कम लोगों को मालूम था ।क़रीब ३०, ३५ वर्ष की गन्दमी रंग की, काफी गठे शरीर की,दरमयाना क़द, काले घुंघराले बालों वाली की सब से ज़्यादा सुन्दर और प्रभावशाली थीं उस की आँखें, और उन में जब काजल लगा हो – बस क्या नशा था उन में कि देखने वाले उन की ताब न सह कर अपनी आँखें झुका लेते थे।
जब मानक की मामी गली में निकलती थी तो कोई उसे ‘इगनोर’ नहीं कर सकता था- खास कर जब वह हल्के पीले रंग की साढ़ी और मैचिंग टाईट बलाऊज़ में, या फिरोज़ी रंग के पंजाबी सूट और दुपट्टे में होती थी तो ३०, ३५ की नहीं लगती थी बल्कि २५ की अल्लड़ जवान और उस पर वह नशीली आँखें !
मुहल्ले में काफी पॉपूलर थी । और यही उस की समस्या भी बन जाती थी । मिसेज़ सेठी जैसी कुछ और भी महिलाएं थीं जो उन्हे पसन्द नहीं करती थीं । उस की शादी को १० साल हो चले थे परंतु उस की अपनी कोई औलाद नहीं थी,और मानक , जो उस का भांजा था उन के घर रहता था, इसलिये उसे लोग उसी के नाम से जानने लगे थे।
मानक मेरा दोस्त है, हम एक क्लास में पढ़ते थे और हम अक्सर एक दूसरे के घर आया जाया करते थे। मानक की मामी हम दोनों से भी बहुत प्यार करती थी, बल्कि मैं तो कहूँगा, वह सब बच्चों से प्यार करती थी। U
मानक ने मुझे एक बार अपनी मामी के बारे मे एक बात बताई थी, जो अब उस की ज़बानी ही आप को सुनाता हूँ ।
”मैं उन दिनों सिर्फ गर्मी की छुट्टियां बिताने अपने मामा के पास आया था, मेरे नाना और नानी भी थीं , सब साथ साथ रहते थे।
गरमी के कारण रात को पंखा चलाना पड़ता था और मुझे पंखे की हवा अछी नहीं लगती थी, इसलिये मैं बरामदे में सो जाता था। मुझे उस रात ठीक से नींद नही आ रही थी, मुझे साथ वाले कमरे  से कुछ खटका सुनाई दिया ‘कहीं चोर न हो, ऐसा सोच मैं चुपके से कमरे की खिड़की के पास पहुंचा और अन्दर झांक कर देखने लगा। टेबल लैम्प की मधॅम रौशनी मे,क्या देखता हूँ कि मामी उठ कर बैठी हुई है,फिर उस ने मामा के तकिये के नीचे से चाबी निकाली, सेफ खोली और गहने निकाल, एक एक कर के पह्ने, फिर सेफ को लॉक किया, चाबी सिरहाने के नीचे रख दी। इस बीच मामा बेखबर खर्राटे मारते रहे । मामी ने दरवाज़ा खोला और बाहर निकल सेहन में आ गई। मेरी उत्सुकता बढ़ रही थी ।मैं अजीब उलझन में पड़ गया था कि यह अपने ही घर में चोरी!
अब मामी सीढ़ियों के रासते छत पर पहुंच गई। मैं भी दबे पाँव उस के पीछे पहुंच गया। छत पर बहुत ही हल्की सी रौशनी थी जो गली लगे हुए बिजली के खम्बे से आ रही थी। उसे मेरे आने की आहट तक ना हुई। क्या देखता हूँ कि मामी ज़मीन पर पालती मार कर बैठी हुई है और उस के हाथ में एक बहुत बड़ी गुड़िया है, जिस के बालों पर वह कंघी कर रही है और उस की फ़्राक की सलवटें ठीक कर मामी ने उसे छाती से लगाया। कभी वह उसे चूमती कभी छाती से लगाती और उस के कानों में कुछ बोलती, जो मेरी समझ में तो न आया। क़रीब क़रीब दस मिंट तक यह सिलसिला जारी रहा,और मैं मुग्द, बुत सा बना उसे देखता रहा।मेरी हिम्म्त नहीं पड़ रही थी कि मैं वापिस लौट जाऊँ ।
मामी ने आखिरी बार गुड़िया को गले लगाया और एक छोटी सी सन्दूकची में बन्द कर छत पर बनी ‘बरसाती’ के एक कोने मे रख दिया और नीचे उतर आई ।मैं भी चुपके से उस के पीछे
पीछे नीचे आ गया।
मामी अपने कमरे में चली गई,  उस ने सारे गह्ने उतार कर अलमारी में रख दिये और सो गई ।
मैं भी आकर अपनी चारपाई पर लेट गया और सोने की कोशिश करने लगा। मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि मामी शायद पागल हो गई है या फिर किसी प्रकार का कोई जादू टूना कर रही थी। मन में भय सा आने लगा । काफी देर बाद नीँद आई और सुबह देर से उठा। देखा मामी किचन में नाशता बनाने में लगी हुई है। मैं उसे चोर नज़रों से देखता रहा, लेकिन उस के चेहरे और उस के व्यवहार से बिलकुल कुछ पता नहीं चलता था कि वह रात को अजीबोगरीब हरकतें कर रही थी।
”मुन्ना! क्या लोगे नाशते में?” उस ने बड़े प्यार से मुझे पूछा
” कुछ भी”
” कुछ भी क्यों? अपनी पसन्द की कोई चीज़ बताओ। नानके(नन्हाल) आये हो । नहीं तो तुम्हारे मामा नाराज़ हो जायेंगे मुझ से कि मैं ने भांजे की खातिरदारी में कमी कर दी ”
”अच्छा, अंडा ब्रेड लूंगा ”
” यह हुई न बात”, और उस ने मेरे लिये नाशता तैयार किया।
मैं ने इस घटना का किसी से ज़िक्र नहीं किया और कुछ दिनों में भूल गया ।
मानक की यह बातें मुझे अब याद आईं , जब मुहल्ले मे यह खबर आग की तरह फैल गई कि मानक की मामी किसी के साथ भाग गई। मेरा मन नहीं मान रहा था।
पर लोग भांति भांति की बातें करने लगे।
”अरे! मै ना कहती थी कि उस के लच्छण अच्छे नहीं थे। कैसे गैर मर्दों को घूर घूर कर आँख मट्टका करती थी”, श्रीमती जैन बोलीं ।
”मैं ने उसे कई बार रात को बाहिर जाते देखा है।”कमला ने अपनी राय दी
” हाँ,  मै ने उसे छ्‌त की बरसाती में अकेले जाते हुए देखा है, ज़रूर उस का यार वहाँ छिप कर बैठता होगा”, पप्पू की माँ, भला कहाँ पीछे रहने वाली थी।
लेकिन मिसेज़ मेहता ही कुछ अलग से बोलीं, ” आप लोग कुछ भी मुँह में आया बोले जा रही हैं । उस बेचारी को रात को नींद में चलने की बीमारी थी,  न जाने इस हालत में वह कहाँ होगी?”
” नींद में चलने की बीमारी तो केवल एक बहाना था”, मंजू सहगल ने भी अपनी राय दे डाली |
“अच्छा, यह बताओ कि तुम जो हर रोज़ कमर दर्द की शिकायत करती रहती हो, क्या हम इसे सच समझें या कि एक बहाना” मिसेज़ मेहता कुछ तीखे अंदाज़ में बोली|
”अरे बहन जी, आप मुझ पर ही शक कर रही हैं “
“शक की बात नहीं है, अब जो बीमारी दिखाई न पड़े, उस के बारे में तो कुछ भी कहा जा सकता है | किसी को सिर र्द्‌द हो, या कमर में पीड़ा तो न दिखने पर भी हम मान लेते हैं और तरह तरह की दवाईयाँ ट्राई करते हैं,  परंतु इतनी बड़ी बीमारी को हम बीमारी न मान कर इसे बहाना या मज़ाक़ समझते हैं’’ मिसेज़ मेहता फिर बोलीं ।
”नहीं भई, सच में यह एक बीमारी है। मेरे मायके में एक आर्मी के रिटार्यड मेजर रहते थे जो रात को अपनी पूरी वर्दी पहन, मुहल्ले में चक्कर ल्गाया करते थे।”  कांता बह्न, जो अब तक चुप चाप खड़ी थी, भी ग्रुप-डिस्कशॅन में हिस्सा लेने के लिये कूद पड़ीं ।
अब सुषमा भाभी भला क्यों पीछे रह्तीं ,उन्हें भी कुछ याद आ गया।, ”हाँ, हाँ हमारे गाँव में भी एक पुरुष था जो रात को सिर पर चारपाई रख कर गली मे घूमता और फिर वापस जा कर सो जाता था। कहते हैं, नींद में चलते हुए को रोकना या टोकना नहीं चाहिये, क्योंकि उन्हे कुछ पता नहीं होता कि वह ऐसा कर रहे हैं, बेचारी मानक की मामी”।
”यह एक मानसिक बीमारी है और हमें ऐसे लोगों से सहानुभूति होनी चाहिये और इस का पूरा इलाज होना चाहिए।”
”परन्तु आप यह कैसे कह सक्ती हैं कि मानक की मामी को वास्तव में यह नींद में चलने की बीमारी थी?”
जितने मुँह, उतनी बातें।
किन्तु सब की ज़बानें बन्द हो गई, जब दो दिन बाद मानक की मामी वापस आ गई और वह भी एक बच्ची के साथ| अब लोग हैरान थे कि यह सब क्या था|
लेकिन जब पूरी बात का पता चला तो सब की नज़रों में मानक की मामी की इज्ज़त बहुत बढ़ गई| वुही औरतें जो उस की बुराईयां करते नहीं थकती थीं,अब उस की तारीफ़ कर रही थीं| उस ने काम ही कुछ ऐसा किया था | उस के मैके में एक हादसे में एक परिवार के सब सदस्य मारे गए थे ,केवल एक बच्ची बची थी जो पोलियो की मरीज़ थी और उसे कोइ भी रखने को तैयार नहीं था| जब मानक की मामी को पता चला तो वह रातों रात बिना किसी को बताये वहाँ गई और उसे गोद ले लिया |
.. मानक की मामी मुहल्ले में अब भी उसी  शान से निकलती है, पर लोगों की निगाहों में ईर्ष्या और जलन की बजाये सम्मान और आदर की भावना होती है।

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Posted by on Aug 14 2011. Filed under Hindi. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. Both comments and pings are currently closed.

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