हाय ये बीमारियां संत राम बजाज

Rajesh Khanna in Anand movie

एक ज़माना था जब लोग अपनी बीमारी छिपाते थे । यदि किसी को टीबी हो तो कह्ते थे खांसी बिगड़ गई है, या फिर किसी को हार्ट अटैक हुआ तो कहा जाता था कि पेट का दर्द है  या गैस बनी हुई है  । परंतु आजकल बीमारी एक प्रेस्टीज सिम्बल (prestige symbol), बन गई है । देखिये मैं बीमारी या उन से पीड़ित रोगियों का मज़ाक़ उड़ाने की कोशिश बिलकुल नहीं कर रहा हूँ, बस ज़रा आजकल के लोगों के उन के प्रति उन के व्यवहार की बात करने जा रहा हूँ।

जितनी बड़ी बीमारी उतना ही वह व्यक्ति उस पर गर्व से छाती फुला कर उस के बारे में बात करता है। और वैसे भी आजकल की बिज़ी लाईफ में किस के पास समय है कि वह छोटी छोटी बीमारियों – पेट का दर्द, कान का दर्द, सिर में पीड़ा या नाक का बहना आदि के बारे में सुने।

ज़माना बहुत आगे बढ़ गया है।  बीमारी  हो तो जैसे राजेश खन्ना को फिल्म आनन्द में हुई थी “lymphosarcoma of the intestine”  ..,या फिर  राज कुमार  को फिल्म दिल एक मन्दिर  में- blood cancer.., या देवदास वाली शराब से हुई IIcirrhosis of the liver”

लोग  ध्यान देकर सुनेंगे और  सहानुभुति दिखायेंगे।

कुछ समय पहले एक मित्र के हार्ट का बाई-पास- ऑपरेशन हुआ था । उन्हें एक पार्टी में देखा तो वह प्रसन्नचित, अपनी क़मीज़ खोले अपने  ऑपरेशन के ज़खम दिखा रहे थे और पूरी तरह से कैसे ‘रिब केज’ को काटा और कहाँ से टांग में से नस काट कर लगाई, इस के बारे में विस्तार से बता रहे थे।

लोग बड़े ध्यान से सुन रहे थे – और उन साहिब के चेहरे पर एक अजीब सी लाली आ रही थी जैसे उस माँ के चेहरे पर जब वह अपना नवजात शिशु दूसरों को गर्व से दिखाती है ।

Iअरे भई, मुझे फीकी चाय देना,  वह ऐसा है ना डॉक्टर ने मना किया है “, एक और दोस्त को कह्ते सुना\,

क्या शूगर है” हम ने डरते डरते पूछा।

IIअजी डायबटीज़ बी है, एक इंजेकशन रोज़ लागता है” , वह बड़ी शान से बोले। IIअजी आजकल यह मामूली बात है,  अब हमारा काम ही ऐसा है –  बड़ा बिज़नेस है, ऐक्स्रसाइज के लिये समय निकालना मुश्किल है”,  वह साहिब बड़े खुशी खुशी बोल रहे थे, जैसे डायबीटीज़ कोई बहुत ही मामूली बीमारी हो, जब कि आज कल की बहुत ही घातक बीमारियों में गिनी जाती है यह।

खैर कुछ भी हो,  क़ुछ बीमारियां ज्यादा ड्रावनी लगती हैं जो वास्तव में होती नहीं हैं- जैसे कुछ वर्ष पहले सिडनी के पानी में Giardia और cryptosporidium के पाये जाने से लोगों में दहशत फैल गई थी – यही एक पहला मौका था जब हमें कोई चिंता नहीं हुई थी – भला जिस किसी ने दिल्ली या भारत के किसी भी शहर का पानी पिया हो, उस का ये छोटे मोटे कीड़े क्या बिगाड़ सकते हैं? और हाँ, पहले इतनी बीमारियां कहाँ थीं ? कैंसर, हाई ब्लड प्रेशर, हाई कलोस्ट्रल, सट्रेस, स्ट्रोक, डिपरेशन, डायबेटीज़, किडनी प्राबलम, लिवर प्रबलम और न जाने क्या क्या । हो भी सकता कि सब हों ,पर हमारे पास उन का पता लगाने के लिये इतने साधन न हों जो कि आजकल की टॉकनौलोजी ने हमें दिये हैं। शायद न जानने में भी भलाई हो क्योंकि आजकल इन की जानकारी टी-वी और रेडियो पर या समाचार पत्रों में इस प्रकार से दी जाती है कि  पढ़ कर या सुन कर ऐसे लगने लगता है कि जैसे यह बीमारी हमें है और फिर भागते हैं डॉकटर की सर्जरी की ओर, अब डॉकटर यदि दो तीन दवाईयां न लिख कर दे या ऐक्स-रे या बल्ड टेस्ट न कराये तो तसल्ली नहीं होती और डॉकटर की कुशलता पर शक सा होने लगता है। और अंत में टेस्ट आदि कराने के पश्चात यदि आप को कोई बीमारी न निकले तो  बड़ी मायूसी होती है और क्या ऐसा नहीं लगता कि आप के साथ धोखा हुआ है। खाहमखाह पैसा और समय बर्बाद हुआ।

आजकल की माडर्न बीमारियों की माडर्न दवाईयां – वह पहले वाली बात नहीं है कि बनफशे का काढ़ा पिया और खांसी, नज़ला और ज़ुकाम झट से गायब या फिर ‘राम बान ‘ चूर्ण खाया और पेट का दर्द समाप्त। दिमाग काम नहीं कर रहा तो नाशते में बादाम की गिरी खाईये और अक़ल्मन्द बन जाईये।

चोट लगी है तो दूध में ह्ल्दी पी लो। या फिर ईट या पत्थर को गर्म करके कपड़े में लपेट उस जगह पर सेंक किया जाता था, परंतु आजकल उस का बिलकुल उल्ट, बर्फ की टकोर की जाती है। अच्छा और सुनिये, पहले जब किसी को बुखार होता था तो हकीम लोग मरीज़ को पानी पीने की मनाही करते थे और कहते थे कि मरीज़ को खूब पसीना आने दो ताकि बुखार खत्म हो जाये.. हालांकि डीहाईडरेशन, से चाहे रोगी की मृत्यु ही क्यों न हो जाये । क्या आजकल ऐसा सोच भी सकते हैं? मुझे याद है, बचपन में मेरे साथ ऐसा कुछ हुआ था वह तो क़िस्मत अच्छी थी कि मेरे ह्ठ करने पर कि मुझे मन्दिर वाले कुएं से यदि पानी पिलाया जाये तो मैं ठीक हो जाऊंगा, घर वाले मान गये और मैं ठीक हो गया और साथ साथ वह मन्दिर वाला कूआं भी बड़ा मशहूर हो गया! जिस तरह से डॉक्टर लोग आजकल घी और दूध के पीछे हाथ धो कर पड़े हुए हैं,  हैरानी होती है। घी को काफी बीमारियों की जड़ बताया जा रहा है। कहते हैं तेल प्रयोग करें और वह भी खास क़िस्म का,  पॉली-अनसैचुरेटड या ओलिव ऑयल।  अब परांठे बिना मक्खन के ! क्या आप सोच भी सकते हैं?

और फिर क्या भरोसा कल को इस तेल को भी हानिकारक कह दिया जाये।

मुझे याद है जब भारत में ट्रेन में सफर कर रहे होते थे तो झोला लटकाये कई तरह तरह की दवाईयां बेचने वाले आते थे। कोई आंखोँ का सुरमा बेचता तो कोई दाँत का मंजन। वे लोग अपने काम मे बड़े तेज़ होते थे । कुछ मुसाफिरों की आंखोँ में मुफत में दवाई डाल वे हाथों हाथ  कई शीशीयां बेच लेते थे। और मंजन बेचने वाले तो केवल दो उंग्ली से कई लोगों के दुखते दाँत तक बिना दर्द के निकाल  दिया करते थे। IIसेपटिक” और IIइंफे कशन” के नाम ही उन लोगों को पता नहीं थे। और वह जो सड़कों के किनारे या क़ुतब मिनार और लाल क़िले जैसे टूरेसट स्पाट  के बाहर मजमा लगाये शलाजीत और सांडे का तेल – हर मर्ज़ की दवा बेचने वाले कितनी भीड़ इकठी कर लेते थे। झोला छाप डॉक्टर आजकल भी कम नहीं हैं।  ह्कीम राधेश्याम या हकीम चंद्‌गीराम हर बीमारी का इलाज जानते थे। आजकल की तरह नहीं कि हर बीमारी का अपना स्पेशलिस्ट है और हर स्पेशलिस्ट एकसरे, MRI,, ब्लड टेस्ट, यूरिन टेस्ट आदि कराने के बाद तरह तरह की गोलियां लिख कर देता है । दवाईयों में कई बार ताल मेल मिलाना पड़ता है डॉक्टर्ज़ को – जैसे किसी के साथ Aspirin ठीक है तो किसी के लिये यह घातक क्योंकि वह खून पतला करती है, किसी को calcium की गोली से लाभ है तो किसी को उस से नुकसान – अजीब गोरख धंधा है !

सवेरे गोली खाईये, दोपहर को गोली खाईये और रात को भी गोली – अर्थात गोलियां ही गोलियां – और इस प्रकार गोलियों से भरी शीशयॉं  का भंडार सा लाग जाता है हर घर में या यूँ  कहिये कि हर घर में एक अच्छी खासी कैमिस्ट की दुकान बन जाती है – होता यह है कि एक डिब्बी में ५० या ६० टेबलिट्‌स होती हैं जिस में से १५, २० तो बच ही जाती हैं, क्योंकि या तो आप ठीक हो जाते हैं या डॉकटर दवाई बदल देते हैं। अब न तो यह दवाई खाई जाती है और न ही फैंकने को दिल मानता है – समझ में नहीं आता कि इन का क्या किया जाये , हाँ शायद अपनी वसीयत (will) में लिख जायें कि बच्चों में बराबर बराबर बाँट दी जायें।

हालांकि आजकल की कई बीमारियां ऐसी हैं जो कि खाने और व्यायाम से ठीक हो सकती हैं, पर लोगों के पास समय नहीं है। और एक बात,  भारत में हालांकि आजकल हर बीमारी का इलाज, पूरी तरह से हो सकता है प्रंतु फिर भी पैसे वाले लोग विदेश में इलाज कराने जाते हैं – कुछ दिखावे के लिये और कुछ प्राईवेसी -अर्थात अपना रोग गुप्त रखने के लिये। और आजकल, बीमारियों का इलाज बहुत मेहंगा होता जा रहा है कि हर आदमी के बस की बात नहीं रही। कहा जाये तो गरीब को कोई हक़ नहीं बनता कि वह बीमार पड़े क्योंकि गरीबी तो खुद एक बहुत बड़ी बीमारी है।

एक बात और बताईये, जब आप गोलगप्पे (पानी पूरी) की रेढ़ी से चाट आदि खाते थे तो क्या कभी पास बह्ती गन्दी नाली की ओर ध्यान दिया करते थे कि वहां से कोई बीमारी भी लग सकती है।

उसी नाली की गन्दगी से मक्खी मच्छरों से फैली कई बीमारियां के बारे में कितने लोग सोचते हैं? पहले तो  लोग मलेरिया को ही जानते थे पर अब डेंगू बुखार भी बड़ा जानलेवा बना हुआ है।

इस तरह कुछ और भी बीमारियां हैं जिन की हम यहां बात नहीं कर रहे है, जैसे वहम की बीमारी, जिस का इलाज तो लुक़मान हकीम के पास भी नहीं था। या भ्रष्टाचार की बीमारी जो एक छूत की बीमारी की तरह फैली हुई है और जो आम तौर पर पोलिटीश्यन या सरकारी अफसरों को लगती है,(जिसे दूर करने के लिये  अन्ना हज़ारे जैसे समाज सेवक अनशन पर अनशन किये जा रहे हैं। और न ही हम प्रेम रोग की बात कर रहे हैं –  उन के बारे में फिर कभी सही!

खैर,  भाईयो और बहने,  ज़्यादा घबराने की ज़रूरत नहीं है। आप अपना काम कीजिये – खाईये, पीजिये और enjoy कीजिये क्योंकि कभी न कभी कोई न कोई बीमारी तो होनी ही है,  हाँ इतना खयाल रखिये कि बीमारी चाहे छोटी सी हो नाम ज़रा बड़ा हो .. बस मुस्कराईये और गोली खाईये!

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Posted by on Mar 26 2012. Filed under Featured, Hindi, Humour. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. Both comments and pings are currently closed.

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