हमारा अनशन … संत राम बजाज

 

अन्ना हज़ारे के अनशनों से यदि भारत सरकार परेशान हो सकती है तो क्या हम अपने अनशन से अपनी धर्मपत्नी को प्रभावित नहीं कर सकते?  ऐसा हम ने सोचा था |

अंदाज़े इतने गलत हो सकते हैं   – ऐसा हम ने सोचा न था!

बात कोई इतनी बड़ी भी न थी कि हम उस का इशु बनाते  – हम तो केवल घर में चलते भ्रष्टाचार और पक्षपात की नीति पर अपना विरोध प्रकट करना चाहते थे| आप हैरान तो ज़रूर होंगे कि यह घर में भ्रष्टाचार और पक्षपात की क्या कहानी है?

तो सुनिये ! बात यह है कि श्रीमती जी अपने लिए तो हर महीने कोई न कोई क़ीमती साड़ी, गहना या मेकअप का सामान ख़रीद लेती हैं और हमारी वही पुरानी कमीज़,  पुराने जूते और पुराने सूट साल भर चलते हैं  – दीवाली से दीवाली तक –

जब किसी पार्टी आदि में जाने के लिए तैयार होते हैं तो उन के कथनानुसार  हमारे लिये कोई भी कमीज़ चलेगी और वुही तीन चार सूटों में से कोई एक सूट पहन लो| इन में कुछ variety भी नहीं – आम तौर पर काला,  नीला या फिर ब्राऊन, और जूते तो बस दो ही रंगों के जब कि स्त्रीयों के लिये सैंकड़ों रंगों की साड़ियां और हज़ारों डिज़ाइन और मैचिंग ब्लाउज़! फिर साड़ी रिपीट नहीं होनी चाहिये| लेडी सूटों की कहानी भी कुछ इसी तरह की है|

कानों के बुँदे,गले के हार, हाथों की चूडियाँ, पाँव के सैंडल और पायल और न जाने क्या क्या – हमें यह सब देख कर बड़ी तकलीफ होती है |

एक दो बार प्रोटेस्ट किया भी तो उलटा भाषण सुनना पड़ा कि “क्या बुढ्ढों वाली बातें करते हैं, क्या वहाँ इतने सारे लोगों के सामने नाक नहीं कट जायेगी आप की? क्या देखते नहीं आप कि दूसरी औरतें क्या क्या पहन कर आती हैं| ज़रा ध्यान देना कि मिसेज़ सेठी ,मिसेज़ मेहता और मिसेज़ बैनर्जी क्या नित नए नए फैशन कर के आती हैं और उन के पतियों को कभी शिकायत करते सुना है क्या? और इधर आप हैं कि एक नई साड़ी क्या ख़रीद ली कि पीछे ही पड़ गये|”

देखा तो भैया! हम किस पक्षपात की बात कर रहे थे और जब यह हद से बढ़ जाये और घर के बजट को एकतरफा इस्तेमाल किया जाये तो भ्रष्टाचार के अतिरिक्त और क्या कहलायेगा?

और आज तो पानी सिर से गुज़र गया जब श्रीमतीजी ने एक ‘डायमंड रिंग’ लेने की बात कह डाली|

बहुत समझाया कि यह फजूलखर्ची बंद करो, पैसे का दुरपयोग मत करो, परन्तु कुछ असर नहीं हुआ|

खैर लम्बी बात को छोटा करते हुए – हम ने इस अत्याचार का विरोध करने की ठानी और बीवी को नोटिस दे  दिया कि हम अनशन करेंगे |

हम ने सोचा था कि बीवी जी हमें मना करेंगी या अपने खर्चे कुछ कम करने की बात करेंगी – परन्तु ऐसा कुछ भी तो नहीं हुआ – बल्कि उन्होंने एक कान से सुनी और दुसरे से निकाल दी | शायद सुना न हो, ऐसा जानकर हम ने ज़रा ऊंची आवाज़ में अपना फ़ैसला दुहराया|

“सुन रही हूँ , बहरी नहीं हूँ”| जिसे आप फजूलखर्ची कह रहे हैं, यह तो घर का माल घर में ही है, मैं कौनसा सविस बैकं में  अपना अलग से खाता खोल रही हूँ कि आप लाल पीले हो रहे हैं|

ये गीदड़ भभकियाँ किसी और को देना”, ऐसा कह वह किचन में चली गईं|

हमें ताव आ गया, इन की यह हिम्मत कि हमें इग्नोर (ignore) करें – हम ने इसे प्रेस्टिज  इशु बना लिया –

“तो ठीक है, हम आज से बल्कि अभी से अपना अनशन शुरू करते हैं”

पासा फैंका जा चुका था …

एक घंटा भी नहीं बीता था कि पेट में कुछ कुछ होने लगा, अर्थात कुछ खाने की इच्छा होने लगी |

“नहीं, नहीं”, हम ने मन को समझाया और अपना ध्यान दूसरी ओर करने के लिये टीवी ऑन की, परन्तु वह तो आग में घी साबित हुई | McDonalds के बर्गर और तत्पश्चात KFC के रोस्ट चिकन के विज्ञापन देख कर हम परेशान हो उठे और टीवी  बन्द कर दी|

इस बीच श्रीमतीजी पूजा पाठ से निपट कर आ गईं और हाथ में प्रशाद की थाली थी | उनहोंने पहले तो इधर उधर देख कर जासूसी की कि कहीं हम ब्रत तोड़ तो नहीं चुके, फिर शरारत भरी आवाज़ में बोलीं, “प्रशाद तो लेंगे आप ?”

हमें आशा की कुछ किरण दिखाई दी,लेकिन इस से पहले कि हम कुछ बोलते, वह स्वयं ही कहने लगीं, “ना बाबा ना, यह कैसे हो सकता है, आप ने अन्न त्याग रखा है, फिर मैं क्यों पाप की भागीदारी बनूं |”

ऐसा कह वह घर के दुसरे कामों में व्यस्त हो गईं|

दोपहर तक ही अपनी जल्दबाज़ी पर गुस्सा आने लगा| पर हार मानने में इज्ज़त का सवाल था, इसलिए चुप रहने में ही बहतरी थी|

श्रीमतीजी किचन में पहुंच पूरी तलने लगीं जिस की महक हमारे नथनों में घुस कर तांडव नाच करने लगी|

“यह क्या बदतमीज़ी है?”  हम गुस्से से बोले|

“क्या मतलब?”

“मतलब तुम खूब जानती हो – तुम्हें पता है ना कि हमारा अनशन चल रहा है|”

तो?”

“तो क्या ? यह पूरी क्यों बना रही हो?”

“घर में और लोग भी रहते हैं और वे इस भूख हड़ताल में आप के साथ नहीं हैं|”

“हाँ ,पर तुम कुछ और भी तो पका सकती थीं, पूरी बना कर तुम जान बूझ कर हमारे अनशन को भंग करने की कोशिश कर रही हो”

“आप को अपने आप पर कंट्रोल नहीं है क्या?”

हम दांत पीस कर रह गये|

ठंडा पानी पीने के लिये फ्रिज खोला – सामने ब्रेड, फ़्रूट, कुछ मिठाईयाँ नज़र आईं  और फिर मन डगमगाने लगा|  कोई तो ‘लूपहोल’ होगा ! फ़्रूट तो अन्न नहीं है? मिठाई भी शायद दूध की है और दूध तो पीने की चीज़ है – तो फिर? याद आया कि जब महात्मा गांधी ने दूध न पीने का संकल्प किया था पर डॉक्टरों के अनुरोध पर बकरी का दूध पीना स्वीकार कर लिया था क्योंकि प्रण लेते समय उन के मन में गाय भैंस के दूध का विचार था|

हमारी विचार श्रृंखला को श्रीमतीजी की आवाज़ ने तोड़ा| “ क्यों बेकार में अपने आप को दू:खी कर रहे हैं, भूख सहन नहीं हो रही तो कुछ खा लीजिए”

“रहने दीजिए अपनी नसीहत – कोई बड़ी बात नहीं है| गांधी जी 21-21 दिन का उपवास रखते थे|”

“अच्छा! तो आप अब गांधी बनने चले हैं”, श्रीमतीजी की आवाज़ में कटाक्ष था, “ या फिर अन्ना हज़ारे या बाबा रामदेव? ज़्यादा कष्ट मत दीजिए अपने शरीर को,  कहीं बाबा रामदेव की तरह डॉक्टर

न बुलाना पड़े”

“मुझे यह आप की जली कटी नहीं सुननी हैं, मैं चला बाजार घूमने” –

सोचा इस बहाने वहाँ से चुपचाप कुछ खा भी लेंगे|

श्रीमती जी ने शायद हमारे मन की बात जान ली थी, झट से बोल उठीं,

“ठीक है, भी मैं भी चलती हूँ, मुझे कुछ सामान लाना है, फ़िक्र करने की ज़रूरत नहीं, मैं आप के साथ घूमूंगी नहीं|”

अब कोई चारा नहीं था, उन्हें साथ ले जाना ही पड़ा हालांकि पता था कि सामान लाना तो एक बहाना था उन का असली मकसद हमारे ऊपर नज़र रखना था|

बाजार में जाकर अलग भी हुए, खाने की दुकानें भी बहुत थीं पर हिम्मत नहीं जुटा पाए कि कुछ खायें- पकड़ा जाना क़रीब क़रीब यकीनी था, इस लिये केवल ललचाई नज़रों से देखते ही रह गये|

“कुछ खाया? अचानक श्रीमती जी की आवाज़ ने चौंकाया, “क्यों अपनी आत्मा पर बोझ डाल रहे हैं? मुझ से आपकी यह हालत देखी नहीं जाती, मैं बड़ी देर से छुप कर आप की बेचैनी देख रही थी|

चलिए कुछ खाने के लिये ले लेते हैं|”

“अपनी सहानुभूति अपने पास ही ररखिये”, हम ने रूखेपन से जवाब दिया|

“अच्छा आप चाहते क्या हैं, यही न कि मैं डायमंड रिंग न खरीदूं? चलिए मान ली आप की बात, मैं नहीं लूंगी रिंग – और तो और इस के बदले में आप एक नया सूट ख़रीद लें जो कल पार्टी में पहन कर चलें|”

हम हैरान हो गये, बीवी की बातें सुन कानों पर विशवास नहीं हो रहा था, और हम उन्हें शक की

नज़रों से घूरने से लगे|

“आप को कैसे यकीन दिलाऊँ कि मैं यह सब सच्चे मन से कह रही हूँ”

हम ने पहली बार महसूस किया कि श्रीमतीजी की आवाज़ में गुस्सा या व्यंग नही था और वह

यह बात मन से ही कह रही थीं|

बीवी की इस क़ुर्बानी पर हमारा दिल पसीज गया और आँखें नम हो गईं|

“ठीक है, लेकिन मेरी एक शर्त है|”

“वह क्या?”

“वह यह कि सूट तुम्हारी पसंद का खरीदेंगे, परन्तु …”

परन्तु क्या?”

“परन्तु यह, कि डायमंड रिंग हमारी पसंद की होगी”

“क्या?”

“जी ठीक सुना आप ने”, हम बोले,

“दोनों एक साथ खरीदेंगे …. लेकिन

लेकिन पहले कुछ पेट पूजा कर के अनशन की समाप्ति की घोषणा तो कर दें|”

 

Short URL: https://indiandownunder.com.au/?p=1283

Posted by on Apr 19 2012. Filed under Community, Featured, Hindi, Humour. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. Both comments and pings are currently closed.

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