मौत से भिड़ंत

संत राम बजाज

”मैं सब कुछ दूर खड़ी देख रही थी। मैं ने सारे परिवार के दुःख को देखा है। मैं आगे आ कर सब से क्षमा मांगना चाहती थी, परंतु मुझे ऐसा करने की आज्ञा नहीं है। मेरी भी कुछ सीमायें हैं। यह मत सोचो, कि मैं केवल लोगों को मारने आती हूँ। यह तो मैं कर ही नहीं सकती, यह तो भगवान का काम है। मेरा काम तो आत्मा को उस के पुराने शरीर से निकाल कर भगवान को सुपुर्द करने का है,  उस के बाद वे जानें ।”

मैं अभी अभी अपनी धर्मपत्नी की चिता जला कर आया ही था कि मेरा सामना मौत से हो गया।

”यह तुम ने क्या कर दिया?  इतना अनर्थ? एक पल के लिये भी नहीं सोचा कि मेरा क्या होगा,?”  मै ने मौत को कोस्ते हुआ पूछा। ” मेरी तो दुनिया ही उजाड़ दी तुम ने !”

”मैं तुम्हारे दुःख को समझती हूँ, पर मेरी भी मजबूरियाँ  हैं।”

” मेरे से ज़्यादा क्या हो सकती हैं।”

” तुम नहीं समझोगे, इस समय तुम दुःखी हो, गुस्से में हो। मैं भी कई बार गुस्से मे आ जाती हूँ। मैं छोटी छोटी बातों पर गुस्सा नहीं करती। लोग मुझे निर्दयी, पत्थरदिल, ज़ालिम और न जाने किन किन नामों से बुलाते हैं। मैं सब सह लेती हूँ, क्योंकि मुझे पता है, जब उन्हें सच्चाई का पता चलता है तो वे शांत हो जाते हैं।

मुझे गुस्सा उन हत्यारोँ , आतंकवादियों पर भी आता है जो बड़ी बेरहमी  से बम दुवारा मासूम बच्चों और स्त्रीयों को मार देते हैं।  गुस्सा मुझे उन ताकत के नशे में चूर ताना शाही डिकटेटरों पर भी आता है जो बेगुनाह  निहत्थे लोगों पर गोलियों की बोछार करते हैं। वह बिलकुल भूल जाते हैं कि एक दिन मैं उन की जान में से उन की आत्मा निकालने जब आऊंगी तो उन  का क्या हाल करूंगी।

”लेकिन तुम ऐसे लोगों को इतनी देर खुला क्यों छोड़ देती हो?”

”मेरे हाथ में हो तो मैं इन्हें एक पल के लिये भी नहीं छोड़ूँ,  पर यह तो ईश्वर ने अपने हाथ में रखा हुआ है”

मेरी यह हमेशा कोशिश रह्ती है कि मैं पूरी तसल्ली कर लूँ कि इस आत्मा का नाम मेरी सूची में है , परंतु फिर भी कभी न कभी गल्ती हो ही जाती है। मुझ पर काम का बोझ भी तो बहुत है। तुम्हें तो याद होगा, एक बार जब तुम  हवाई जहाज़ में सफर कर रहे थे और बीमार हो गये थे… ज़रा अपने शब्दों में बताओ, भला क्या हुआ था”

”हाँ, वह चार साल पहले ही हुआ था। सिंगापुर के प्लेन में कैप्टन को जहाज़ के पेसेंजर्स में से एक डॉक्टर को ढूंढना पड़ा था और उस ने कहा था कि मुझे ‘हार्ट अटैक’ हो रहा है।

”हम ने सिडनी में आप के परिवार को सूचित कर दिया है, एम्ब्युलेंस भी एर्पोरट पर वेटिंग में है”, ऐसा मुझे बताया जा रहा था। परंतु मुझे कुछ ऐसा मह्सूस नहीं हो रहा था कि मैं मरने जा रहा हूँ। मुझे वह सब अजीब लग रहा था। कह्ते हैं न कि मरने से पहले इंसान को अपने जीवन की पूरी तस्वीर सामने आने लगती है, पर मेरे साथ तो ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा था।

मैं ने कोशिश भी की कि सोचूँ, जैसे कब मैं बीवी के दाल में नमक ज़्यादा डालने पर उस पर बिगड़ा था या कब मैं ने बच्चों को ‘होम वर्क’ न करने पर डाँटा था, या फिर कब मैं ने अपने ग्रेंड्‌सन को McDonald  से बर्गर नहीं दिलाया था। ऐसे ही कई बातों के बारे में सोचा था, परंतु कुछ भी तो नहीं याद आ रहा था, तो क्या मैं मर नहीं रहा हूँ ? क्या यह डॉकटर गल्त बोल रही  है?  याद है… कैप्टन ने जहाज़ को किसी नज़दीकी एर्पोर्ट पर ले जाने की भी बात कह दी थी लेकिन मैं ने उसे ऐसा कुछ भी करने से रोक दिया था। और फिर सिडनी एर्पोर्ट पर प्लेन के लैंड होते ही ”पैरामैडिक” अन्दर आ गये और सब से पहले मुझे उतारा गया और सीधा अस्पताल ले गये थे। मेरे पूछने पर कि मेरे सामान का क्या होगा, उन्हों ने  गुस्से से कहा था, ”तुम्हें सामान की पड़ी है,आप जान की फिक्र कीजिये, सामान की नहीं। वह ऊपर साथ नहीं जाता, आप के घर वालों को दे दिया जायेगा।” अस्प्ताल के बाहर मेरे परिवार के सब सदस्य भारी चिंता में खड़े थे। मुझ से ज़्यादा वे घबराये हुए थे।

खैर, अस्प्ताल में सारे टैस्ट  किये गये और भगवान की कृपा से सब ठीक ठाक था”

”देखा, अब तुम भी भगवान को ही ‘क्रेडिट’ दे रहे हो, यदि कुछ हो जाता तो सब मुझे ही गालियाँ देते। मैं तो बार बार अपनी लिस्ट चैक कर रही थी कि कहीं गल्ती न कर बैठूँ।

मेरा काम ही ऐसा है कि मुझे हमेशा सब की दुत्कार ही मिलती है। हाँ, कभी कभार हिटलर जैसे किसी दुष्ट व्यक्ति  को मै ले जाऊँ तो लोग मेरा धन्यवाद अवश्य कर देते हैं ।

अब कई लोग भगवान की दी हुई तकलीफों से तंग आकर मुझे बुलाते हैं और कहते हैं कि उन्हें उठा ले जाऊँ ताकि उन्हें इस पीड़ा से छुटकारा मिले। परंतु मै बेबस हूँ, मैं उन के दुःख से खुद दुःखी हो जाती हूँ , मुझे उन पर बहुत तर्स भी आता है लेकिन मैं उन के लिये कुछ नहीं कर पाती। समय और स्थान तो पहले से ही निर्धारित होता है,  मुझे तो केवल भगवान की ही आज्ञा का पालन करना होता है। अब तुम अपनी धर्मपत्नी को ही ले लो, तुम अपने घर से इतनी दूर वाले अस्पताल में क्यों आये जबकि तुम्हारे घर के पास ही सब सुविधाएं प्राप्त थीं ।”

”यही तो रोना है कि हम यदि यह गल्ती न करते तो आज मेरी अर्धांगिनी जीवत होती ।”

”फिर गल्त सोच रहे हो! यह तुम्हारे हाथ में नहीं था, अभी अभी मैं ने कहा ना कि समय और स्थान निर्धारित था। मैं तो वहाँ, पहले ही इंतज़ार कर रही थी।”

”फिर क्यों नहीं हमें, बात तक करने का समय दिया?”

”बात करने में तुम्हें तकलीफ होती, उन्हें भी होती, जो मैं नहीं चाहती थी। मैं जब भी आत्मा को लेने आती हूँ, मेरी कोशिश होती है कि उसे पूरा आदर और मान दे सकूँ। मेरी मानो, तो तुम अब इस सत्य को मान लो और ‘नॉर्मल’ होने की कोशिश करो”

”कैसे नॉर्मल हो सकता हूँ?  तुम ने तो मेरा सब कुछ छीन लिया है। मैं हर मामले में पूरी तरह से उस पर निर्भर था। मुझे तो ढंग से चाय तक बनानी नहीं आती।”

”तो तुम केवल अपने स्वार्थ के लिये यह सब कह रहे हो”

”नहीं, तुम इतनी कठोर कैसे हो सकती हो। हमें तो एक दूसरे की आदत सी पड़ चुकी थी। कभी सोचा भी न था कि हम एक दूसरे से अलग होंगे।”

”ज़रा अपने चारों ओर नज़र घुमा कर देखो तो पता चल जायेगा कि और कितने लोग ऐसी ही स्थिति में हैं। ”

”अच्छा यह जो तुम बार बार आत्मा की बातें कर रही हो,ये अलग अलग धर्मों में इस का महत्त्व ही अलग अलग है।”

‘कौन गल्त है और कौन सही, मैं इस झंझट में नहीं पड़ती। यह सब तुम्हारा आपसी मामला है। तुम्हारे धर्म के अनुसार तुम्हारी आत्माएं चोला बदलती हैं तो किसी दूसरे के अनुसार वे ‘डूमसडे’ या ‘क़यामत’ का इंतज़ार करती हैं, मैं तो बस उन्हें उन के जिस्म(तन) से निकालने का काम करती हूँ।”

मैं भी कभी कभी थक जाती हूँ, फिर भी मैं कोई छुट्टी नहीं करती, मेरे लिये ‘वीकएंड’ एक सपना है। मैं अपना काम पूरी लगन के साथ करती हूँ जैसे सूर्य अपनी किरनें बिना किसी भेद भाव के दुनिया के सब देशों को देता है। हालंकि उन्हें अपनी अपनी बारी का इंतज़ार करना पड़ता है, जबकि मैं तो दिन रात की भी परवाह नहीं करती। यदि मैं काम ठीक से न करूँ तो दुनिया रुक सी जायेगी। भगवान नए लोगों को कैसे भेज पायेंगे?”

” मैं एक सच्चाई हूँ फिर भी लोग मुझे मानने से घबराते हैँ। भगवान को किसी ने देखा नहीं है फिर भी लोग उस के आगे धूप अगबत्ती जला जला कर दिन रात प्रार्थना करते रहते हैं और मुझे अछूत समझ कर मुझ से दूर भागते हैं।”

”तो तुम इस का बात का बदला ले रही हो?”

”बात बदले की नहीं है, मैं तो खुद ईश्वर के ही आदेश में रह कर काम करती हूँ। भगवान के बनाये हुए नियम तो भगवान खुद भी नहीं तोड़ते । जब भी वह इंसान बन कर धरती पर आते हैं, अंत में उन्हें लेने मैं ही आती हूँ।

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Posted by on Sep 20 2012. Filed under Community, Featured, Hindi, Humour. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. Both comments and pings are currently closed.

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