हाये कुर्सी हाये !

santram - kursi

–  संतराम बजाज

इंद्र देवता एक दम चौंक कर उठे और अपने गुप्तचरों को बुला इस खलबली का कारण पुछा जिस की वजह से उन का सिंघासन डोल रहा था|
“क्या विश्वामित्र ने फिर से तपस्स्या शुरू कर दी है?”

“नहीँ देवराज, ऐसी कोई बात नहीं है|”

“तो यह गर्जन कैसी? यह मेरे सिंघासन को झटका कैसे?”

“वह तो बहुत छोटी से बात है, पृथ्वी पर भारत देश की राजधानी दिल्ली में एक कुर्सी को लेकर शोर शराबा हुआ था|”

“क्या मतलब शोर शराबा?” इंद्र बोले |

“जी, वह सत्ता की छोटी से कुर्सी, आप के सिंघासन के सामने तो कुछ भी नहीं, एक दूसरे की ओर फैंक रहे थे, कोई भी उस पर बैठना नहीं चाहता था| उसी से वह थोड़ी सी हलचल पैदा हुई थी, आप को चिंता करने की कोई ज़रूरत नहीं |”

“विचित्र! क्यों बैठना नहीं चाहते थे?  सिंघासन चाहे छोटा हो चाहे बड़ा, आखिर सिंघासन है| मैं तो अपने सिंघासन पर किसी की बुरी नज़र भी नहीं पड़ने दूंग |

ज़रा विस्तार से बताओ”

“जी वह एक नई पार्टी ‘आम आदमी पार्टी’ के नाम से बनी है| उन का दावा था कि राजनीति में फैले भ्रष्टाचार के कीचड़ को झाड़ू  से साफ़ कर देंगे| इस के  लिये उन्हों ने अपना चुनावी चिन्ह  भी झाड़ू ही रखा|

उस पार्टी में सब नौसिख्या परन्तु बेदाग़ और साहसी पढ़े  लिखे लोग इकट्ठे हुए| उन्हें दूसरी पार्टियों ने गंभीरता से नहीं लिया अपितु उन की खिल्ली उड़ाई|

परन्तु जब परिणाम सामने आये तो बड़ों बड़ों की हवा सरक गई | कई दिग्गज नेता, जिन में उस प्रदेश की मुख्य मंत्री शीला दीक्षत भी थी अपनी सीटें हार गये| परन्तु  ….”

“परन्तु क्या? “

“उन की सीटें कुछ कम पड़ गई और सरकार बनाने के लिये वे किसी का समर्थन लेना नहीं चाहते थे और उन से ४ सीट ज्यादा वाली पार्टी ‘भारतीय जनता पार्टी’ को भी ऐसे ही समर्थन की आवश्यकता थी “

“तो, आपत्ति क्या थी? “

“आपत्ती, यह कि कांग्रेस पार्टी जो राज चला रही थी उस का एकदम सफाया हो गया, पर विडंबना यह हुई कि समर्थन देने के लिये भी वही बचे थे|

खैर, अंत में कीचड़ ने झाड़ू को हाथ दिया और अब शांति सी लगती है|

पृथ्वी लोक में आम तौर पर राजनीति में देखा गया है कि लोग कुर्सी के पीछे किस तरह से भागते हैं और कुर्सी लेने के लिये तरह तरह के हथकंडे अपनाते हैं| एक दूसरे की पीठ में छुरा घोंपते हैं| कारण साफ़ है कि उस कुर्सी पर बैठते ही उन के हाथ में सत्ता की जादूई छड़ी आ जाती है जिसे से वह अपने लिये धन दौलत से अपनी तिजोरियां भर सकते हैं और आम आदमी के ऊपर अपना दबाव रख सकते हैं| किन्तु, पहली बार देखा  गया कि उस कुर्सी पर कोई भी बैठने को तैयार नहीं था | ‘पहले आप, पहले आप’  की  होड़ लगी थी | अर्थात कुर्सी पीछे पीछे  भाग रही थी कि कोई उस पर बैठे |

आखिर में उस पार्टी ने बैठना स्वीकार किया जिस का नाम भी संयोगवश ‘आप’ ही है – ‘आम आदमी पार्टी – Aam Aadmi Party’

परन्तु, ये नए लोग कुछ अलग ही तरह के लगते हैं, उन्होंने आते ही लोगों के साथ किये वचनों को पूरा करने की सोच ली| हर घर को ७०० लिटर पानी निशुल्क और बिजली के दामों में ५०% छूट!”

“यह क्या पागलपन है?”

“जी, यही नहीं, बेघर गरीबों को ठंडी से बचने के लिये बने रैन बसेरों में जा जाकर वहाँ लोगों की स्थिति सुधारने में भी जुट गये और लोगों की शिकायतें सुनने और दूर करने के लिये जनता दरबार लगाने शरू कर दिए”

“तो क्या हमारे इंद्र दरबार की भाँती वहाँ अप्सराएँ नाचेंगी?”

“जी नहीं, यह जनता दरबार है और वहाँ अप्सराओं का  नहीं, भ्रष्टाचारी अफ़सरों का नंगा नृत्य होना था, परन्तु इतने ‘उत्सुक’ लोग वहाँ पहुंचे कि  को भीड़ संभालना मुश्किल हो गया और अब वह सब  नहीं होगा|”

“अति रोचक!”, इंद्र देवता जी को भी आनंद आ रहा था|, “ तो अब लोग अपनी समस्याएं कैसे पहुंचा सकेंगे ?”|

“दूसरे बड़े साधन हैं -ईमेल,टेलीफोन ,चिट्ठी आदि  से|

अब आम आदमी पार्टी वाले लोक सभा चुनावों में पूरी ज़ोर शोर से कूद रहे हैं जिस से प्रधान मंत्री बनने के दावेदार नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी, दोनों की नींद उड़ गई है कि कहीं उन का हाल शीला दीक्षत और डा: हर्ष वर्धन जैसा न हो जाये|”

“जब कीचड़ ही नहीं रहेगा तो कीचड़ में कमल के खिलने की संभावना भी कम हो जायेगी|”

“कुछ कह नहीं सकते, सब डरे हुए हैं |इस से हलचल सी मच गई है |

‘आप’ वाले सयासत में एक नई सोच लेकर आये हैं|

इस से दूसरी पार्टियां भी सोचने पर मजबूर हो गई हैं कि सत्ता की उस कुर्सी पर केवल बैठने से काम नहीं चलेगा, कुछ कर के दिखाना होगा”|

“अद्भुत!” देवराज इंद्र बोले,” कहीं उस आम आदमी से हमें तो कोई खतरा नहीं है, सावधानी बरतनी होगी”

“नहीं, हमारे यहाँ तो ‘डेमोक्रेसी’ है ही नहीं तो चिंता वाली कोई बात नहीं, वैसे भी आप तो पानी और वर्षा के देवता हैं, आप ७०० लिटर की बजाए १०००/२००० लिटर पानी दे कर जनता को अपनी ओर कर सकते हैं| वास्तव में खतरा तो केजरीवाल को होने लगा है क्योंकि दूसरे हारे हुए लोग चुप नहीं बैठेंगे और किसी न किसी तरह से केजरीवाल सरकार के विरुद्ध कोई न कोई षड्यंत्र अवश्य रचेंगे|”

“तो ठीक है, तुम जाओ, हम विश्राम करेंगे|”, ऐसा कह इंद्र देवता अपने विश्राम कक्ष में चले गये|

….चलिए हम धरती के लोग भी अब इंद्र देव की चिंता और राजनीती की कुर्सी को छोड़ एक और कुर्सी की बात करें, जो सत्ता की कुर्सी से हट कर भी बड़ी महत्तवपूर्ण है – और वह है बस या ट्रेन की कुर्सी (सीट)|

रश के समय बैठने के लिये सीट का मिलना काफ़ी मुश्किल हो जाता है| जो लोग पहले से बैठे होते हैं, वे अक्सर यह देख कर भी कि दूसरा व्यक्ति बुज़ुर्ग है, अपनी सीट आफर नहीं करते बल्कि आखें बन्द कर नींद का बहाना बना कर चुप चाप बैठे रहते हैं, या फिर कानों में म्यूजिक लगा ध्यान दूसरी ओर कर लेते हैं| कई ढीठ लोग तो ऐसी कुर्सी पर बैठे रहते हैं जो सरासर बुजुर्गों या कमजोर लोगों के लिये निर्धारित होती है|

हाँ एक सीट ऐसी होती है जिस के मिलने की सम्भावना बहुत होती है और वह है तीन सीटों वाले बेंच की बीच वाली सीट|

उस पर कोई भी बैठना पसंद नहीं करता|

मजबूरी की हालत में कई बार बैठना भी पड़ता है|

एक बार की बात है, मेरे दोनों ओर भारी भरकम औरतें और बीच में मैं बेचारा !

दाहिनी वाली औरत ने अपना पर्स खोला, मेक- उप का सामान निकाल अपनी आँखों के बाल नोचने लगी – वह बड़े झटके से एक बाल को ट्रिम करती और दूसरे को उसी तत्परता से काबू में करती |

दूसरी साईड वाली देवी अपने आइ-पैड पर कुछ message टाईप करने लगी |

आप कहेंगे कि मुझे भला क्यों परेशानी होने लगी – तो भय्ये आपकी जानकारी के लिये बता दूं कि मेरे लिये सांस लेना भी मुश्किल हो रहा था, यह तो दूर की बात थी कि  मैं अपनी पैंट की जेब में हाथ डाल अपना रुमाल निकाल सकूं |

एकदम मेरे मन में एक डर सा लगने लगा कि यदि गलती से मेरा हाथ या कोहनी उन में से एक के साथ भी टच कर गये तो कहीं मुसीबत में न फंस जाऊं| मेरी तो ज़मानत भी नहीं होगी क्योंक इसे ‘sexual harassment’ कहा जाएगा|

सोच कर ही पसीने छूटने लगे| मैं ने आँख के कोनों से झाँक कर देखा, दोनों मेरी परेशानी से बेखबर अपने अपने काम में मस्त थीं|

परन्तु मेरी घबराहट इतनी बढ़ गई कि एक दम उठ खड़ा हुआ और ट्रेन के दूसरे कोने में जाकर खड़ा हो गया|

यह कुर्सी भी अजीब अजीब रंग दिखाती है|

कुछ और तरह की भी कुर्सियों की समस्याओं की बात करते हैं|

जैसे सिनेमा में सब से पीछे हो तो अच्छा और थियेटर में सब से आगे तो ठीक लगता है|

पिछली बार हमारी पिकनिक पर कुछ कुर्सियां कम, पर बैठने वाले ज्यादा थे | एक भगदड़ सी मच गई, ’म्युज़िकल चेर्ज़’ वाली सिचुएशन हो गई| जिस के हाथ जो लगी वह उस पर ऐसे जम कर बैठा जैसे कोई खज़ाना मिल गया हो!

एक बात और कुर्सी के किस्से में, जिस पर बहुत लोग उत्तेजित हो उठते है, वह है ‘पोलिटिशियन की कुर्सी’ को राज गद्दी की तरह समझ बैठना| खासतौर पर हमारे भारत में यदि पिता मंत्री है तो वह अपनी सन्तान को भी मंत्री बनाना चाहता है, अर्थात उस कुर्सी को अपनी विरासत समझ बैठता है और पुत्र चाहे योग्यता न भी रखता हो, पिता वह कुर्सी (गद्दी) उसे ही देने की चेष्टा में लग जाता है|

भारत के कई प्रदेशों में पिता -पुत्र की टीमें कुर्सी पर चिपकी हुई हैं |

वैस तो कुर्सी के इतिहास में जायें तो कुछ अच्छे और कुछ बुरे उदाहरण मिलेंगे|

रामायण में भरत ने उस कुर्सी (राज गद्दी) पर बैठने से इनकार कर दिया था जो उस की अपनी माँ केकई ने उस के लिये असली हकदार राम से छीन ली थी|

जबकि इस का उल्ट महाभारत में देखने को मिलता है, जब दर्योधन राज गद्दी की लालसा में अपने मामा शकुनी से मिलकर अपने चचेरे भईयों पांडवों (जो कि गद्दी के हक़दार  हैं ) के विरुद्ध तरह तरह के षडयंत्र रचता है|

मुगल राज में औरंगजेब ने अपने सगे भाईयों को मौत के घाट उतार कर अपने पिता को ही बंदी बना लिया|

भारत को स्वतंत्रता मिलने पर महात्मा गांधी चाहते तो कोई भी कुर्सी ले सकते थे परन्तु उन्हों ने कोई भी पद लेने से मना कर दिया |

इस प्रकार उन्होंने एक अच्छी मिसाल कायम की, जिस का अनुकरण सोनिया गांधी ने भी किया|

जब २००४ में उन्हें प्रधान मंत्री बनने की आफर हुई, तब उन्होंने वह कुर्सी स्वीकार न करते हुए एक ऐसे व्यक्ति को दे दी जो बड़े भले और काबल थे, जिनका अपना कोई गठबंधन या धड़ा  नहीं था |

यह दूसरी बात है कि कुछ लोग उन के इस ‘बलिदान’ को एक ढकोसला समझते हैं  क्योंकि असली सत्ता तो उन के हाथ में ही रही और जिस के कारण अब वह अपने बेटे राहुल को प्रधान मंत्री बनाना चाहती हैं|

वैसे यदि ठंडे दिमाग से सोचा जाये तो इस में हर्ज ही क्या है?

जैसे किसान का बेटा खेती का ज्ञान रखता है,फिल्म स्टार का बेटा/बेटी फ़िल्मी अदाकारी के दांव पेच जानते हैं, वैसे ही राजनीति  के माहौल में पले,मंत्री के बेटे/बेटियां यदि चाहें तो क्यों नहीं मंत्री बनने की अपेक्षा कर सकते? यह बात भी सही है कि दूसरे विकसित और प्रगतिशील देशों में भले ही ऐसा न हो पर भारत में तो सदियों से यह  प्रथा चलती आ रही है|

हाँ यह ज़रूर हो कि कुर्सी गलत तरीके से न ली जाये, अर्थात दूसरों के साथ कोई भेद भाव या अन्याय न हो|

कुर्सी कोई लकड़ी या लोहे की बनी हुई वस्तु नहीं, हम तो उस के साथ जुड़ी हुई ताकत, सत्ता और ज़िम्मेदारियों को ही कुर्सी कहेंगे| कई लोग लालच में अंधे हो उस का दुरोपयोग करते हैं, रिश्वत खोरी करते है और अपनी  कुर्सी को बेचते हैं अर्थात अपनी  आत्मा को बेच देते हैं|

एक कुर्सी ऐसी होती है जिस पर बैठने वाले को निरपेक्ष हो सच्चाई का साथ देना होता है और वह है ’इन्साफ की कुर्सी’|

उस पर यदि कोई बैठ कर अपनी ज़मीर बेच दे तो देश का पतन आवश्यक है|

सौभाग्यवश भारत में ‘सुप्रीम कोर्ट’ ने सरकार के कई गलत फ़ैसलों पर रोक लगा जनता को इंसाफ दिया है|

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Posted by on Apr 1 2014. Filed under Community, Hindi, Humour. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. Both comments and pings are currently closed.

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