यादें, कुछ मीठी यादें      – संतराम बजाज 

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कल शारदा जी ( जो हमारे शुभचिंतकों में से एक हैं) ने गुड़ के ‘रोट’ बना कर भेजे तो  खाने से पहले ही यादों का सिलसिला शुरू हो गया, जो इन मीठी रोटियों के साथ जुड़ी हुई थीं|

हम तो उसे मीठी रोटियों का ब्रत कहा करते थे, जब ढेरों बहुत मोटी मोटी मीठी रोटियां बना करती थीं और ताज़ा मखन के साथ खाते थे हम लोग चटखारे ले ले कर|

ये रोटियां कई कई दिन चलती थीं और खास बनी हुईं चंगेरों में रखी जाती थीं|

Meethi roti

 

 

 

 

 

 

 

साथ ही साथ गुड़ के  खुरमे (शक्कर-पारे) और गुड़ की ही तांगड़ी भी, चावल और गेहों के भुने दानों के मुरूंडे (लडडू) भी बनते थे |

माँ याद आ गई जो यह सब बनाया करती थी |

माँ केवल मीठी रोटियां या मुरूंडे आदि ही नहीं, बल्कि उड़द की दाल की पिन्नियां भी बनाती थीं जिन का हम बेसबरी के साथ इंतज़ार किया करते थे|

पिन्नियों की बात करें तो, एक बड़ा भारी प्राजेक्ट होता था| कई कई दिन लग जाते थे बनाने में|

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पहले दाल को भिगो कर रखा जाता था फिर उसे ‘दौरी डंडे’ में पीसा जाता था| जी हाँ, उन दिनों बिजली वाली ’मिक्सी’ नहीं होती थी (बिजली भी नहीं होती थी),फिर देसी घी में दाल के भल्ले तले जाते थे, फिर उन्हें दुबारा रगड़ रगड़ कर ,उस में चीनी या शकर और किशमिश, खस्खास, कमरकस, मखाने और बादाम आदि ड्राईफ्रूट , न जाने क्या क्या, मिलाया जाता था| एक चीज़ और ,जो इस में मिलाई जाती थी , वह थी गूंद , जो शायद  पिन्नयों को जोड़ने के लिये थी या फिर जोड़ों अर्थात  घुटनों आदि  की मजबूती  के लिये थी , भून कर डालते थे| पूरी  ‘रेसीपी’ मुझे भला कैसे पता हो सकती है? मैं तो सब मन की आँखों की सहायता से  याद करके आप को बता रहा हूँ| और हमें इस से क्या लेना देना कि पिन्नी कैसे बनीं, हमें तो बस खाने से मतलब होता था |

असली मज़ा तो उस समय होता था जब  हम भाई बहनों में होड़ लग जाती थी कि कैसे ज्यादा से ज्यादा हासिल की जायें| खूब रोना-धोना और झगड़े  होते थे |

माँ  भला भेद भाव कैसे कर सकती थी, वह सब को बराबर बराबर  बाँट देतीं और हम लोग अपने अपने हिस्से को छोटी छोटी कनस्तरियों में ताले लगा ,ऐसे संभाल कर रखते थे जैसे  कोई  क़ीमती खजाना हो| अपने हिसाब से सुबह नाश्ते पे , या शाम को जब दिल किया निकाल कर खाते थे|

जब मैं ने शारदा जी से यह बात कही, तो पता चला कि वह भी ऐसा ही करते थे और अपने हिस्से की जल्दी जल्दी खत्म कर दूसरों की चोरी से खा जाते थे |

शायद, इसी लिये कहा जाता है कि ‘चोरी का गुड़ मीठा होता है’|

बात रोटों से पिन्नियों तक पहुंची तो और भी कई बातें याद आने लगीं जो उन दिनों आम थीं और अब देखने को नहीं मिलतीं|

गुड़ की चाय और वह भी पीतल के बड़े ग्लास में ,और उसे कटोरी में डाल डाल  कर किस स्वाद से पीते थे, पूछो मत! या फिर कप से प्याली में डाल , चुस्कियां ले ले कर पीते थे|

और यह सब होता था कड़कती सर्दी में घर के ‘सेन्ट्रल हीटिंग सिस्टम’-यानी चूल्हे के इर्द गिर्द, सारा परिवार एक साथ  |

आप को भी याद होगा कि जो लोग गाँव में रहते थे, दूध मिट्टी की हांडी में गोबर के उपलों की  धीमी धीमी आंच पर सारा सारा दिन ‘कढता’ रहता था और जो उस के ऊपर मलाई की वह मोटी तह , सोच कर ही मुंह में पानी आने लगा है|

एक और बात याद आ रही है, कि देसी घी की स्पेशल जलेबी  गाँव के हलवाई से बनवाते और फिर दूध में डाल कर खाते थे| दूध तो रात सोने से पहले अवश्य पीना पड़ता था|

माँ के लिये बच्चों को नहलाना भी एक तरह से बड़े  जोखम का काम होता था| गलियों में खेल खेल कर मिट्टी से लतपत शावर के नीचे, मेरा मतलब है ,गाँव के कुँए से पानी की बाल्टी भर कर वहीं , ‘लाइफ  बॉय’ के लाल साबुन से रगड़ रगड़ कर , यह काम होता था| मुझे याद है, कई बार हम भाग खड़े होते थे और फिर रेस होती थी  हम में और बड़े भाई में जिसकी ड्यूटी लगती थी पकड़ने की, या फिर  माँ को ही यह काम करना पड़ता था|

उन दिनों के गाँव  की बात हो रही है तो सुनिये, हर घर में एक छोटी सी दो पथर के पाटों की चक्की होती थी, जिस में दालें आदि पीसी जाती थीं| कई घरों में उन में ही अनाज भी पीसा जाता था| ऊपर के पाट पर एक हैंडल होता  था और मध्य में अनाज आदी डालने के लिये एक सुराख | एक हाथ से चक्की के ऊपरी  पाट को घुमाया जाता था और दूसरे हाथ से साथ साथ अनाज  डाला जाता था| यह क्रिया  बड़ी तेज़ी से होती थी कि आप अंदाजा नहीं लगा सकते| मुझे याद है, हमारे गाँव में युवतियों में आटा पीसने के  competition रखे जाते थे| एक और कम्पीटीशन होता था और वह था चरखा कातने का, जो दिन और रात को भी चलता रहता था| बहनों को खाना पहुँचाने की ड्यूटी हम भाईयों की होती थी|

खेतों में साग, शलगम ,बैंगन, गन्ने – हर चीज़ ताज़ा|

जब गुड़ बन रहा होता था उस की महक अभी तक नथनों में समाई हुई है|

यादों की यह बारात अधूरी सी है, बिना उन दिनों के स्कूल के  ज़िक्र से | याद है ना,  आप को, एक लकड़ी की तख्ती होती थी , जिसे धोकर गाची (मुल्तानी मिट्टी) से लेप कर सुखाते  और शाम को फिर उसे साफ़ कर गाची लगा कर, सुखा कर दूसरे  दिन के लिये तैयार किया जाता था| बस्ते में पुस्तक के नाम पर एक छोटा सा क़ायदा एक सियाही की दवात और एक क़लम , न कोई पेपर, और न ही कोई पेंसिलकेस!(आज कल के बच्चों के कमर-तोड़ बैग देख कर तो जी घबरा जाता है |

मुझे याद आ रहा है कि उस क़ायदे के पिछ्ले पन्ने पर एक लतीफ़ा ( चुटकला )  कुछ इस तरह से था – सवाल .. “ यदि दर्या में आग लग जाये तो मछलियाँ कहाँ जायें?”

जवाब: “दरख्तों (वृक्षों) पर चढ़ जायें”|

शाम को छुट्टी के बाद लाइन में खड़े हो पहाड़े (multiplication tables) सिखाये जाते थे , वह भी गा गा कर| ‘इक दूनी दूनी, दो दूनी चार’, सब को याद होंगे|

वे पहाड़े अभी तक नहीं भूले|

क्या दिन थे वे? (“कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन , वे मेरे प्यारे पल छिन ”- किशोर कुमार के इस गाने की धुन बड़ी याद आ रही है|)

मेरी तरह आप सब की भी कुछ ऐसी यादें हों गी|

उन लोगों के लिये जो अब जीवन के आख़री पड़ाव पर हैं, पुरानी यादों का सहारा एक बड़ा सहारा है| मीठी रोटियों की तरह वे पुरानी यादें भी  मीठी लगती हैं, उन्हें अलग मत होने दीजिए|

वे आज  की दुखदायी यादों को थोड़ी देर के लिये भुलाने  में सहायक हो सकती हैं|

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Posted by on Aug 19 2014. Filed under Community, Featured, Hindi. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. Both comments and pings are currently closed.

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