जब हम क्रिकेट मैच खेले …….

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संतराम बजाज

बात उन दिनों की है जब टेलीविज़न नहीं होती थी, रेडियो सिलौन (आज का श्री लंका) से अमीन सयानी ‘बिनाका गीत माला’ से सारे भारत वासियों का मन बहलाया करता था | और आकाश वाणी वाले रेडियो पर टेस्ट मैचों की क्रिकेट कमेंट्री दिया करते थे|

लोगों में आज की ही तरह क्रिकेट का शौक़ था|

पान वालों की दुकानों के बाहर लोगों की भीड़ देखे बनती थी, दफ्तरों से लोग काम छोड़ स्कोर सुनने के लिये वहाँ पहुंच जाते थे| कमेंट्री के साथ इतना शोर कि स्कोर का पता ही नहीं चलता था| कई पान वाले आम तौर पर एक छोटा सा ब्लैक बोर्ड लटका देते थे और एक आधा volunteer  स्कोर को लिखता रहता था | क्या मज़ा आता था उन दिनों, जब चंदू  ‘बोर्ड’ चौका लगाता था या  विनु मनकड विकेट लेता था| और सब लोग उछल पड़ते थे|

विनु मनकड, विजय हजारे, उमरीगर, मंजरेकर क्रिकेट के महारथी माने जाते थे|

जी हाँ, उस जमाने की बात कर रहा हूँ जब धोनी, तेंदुलकर  तो क्या कपिल देव तक  पैदा नहीं हुए थे और गवास्कर चड्डी पहने घुमते थे | न ही खिलाड़ी करोड़ों में बिकते थे, न ही ‘वन डे’ और २०-२० का नामोनिशान था| केवल टेस्ट मैच हुआ करते थे| ‘मैच फिक्सिंग’ किस बला का नाम था, किसी को कोई ख़बर नहीं थी|

फास्ट और पेस गेंदबाज़, भारत की पिच पर धाराशायी हो जाते थे, केवल स्पिन का बोल बाला था|

हमारा शौक़ भी सब की तरह था, पर खेलने के बारे में सोचा भी नहीं था| हाँ गुल्ली डंडा खूब खेलते थे और कई आँखें फोड़ चुके थे और बदले में थप्पड़ भी खा चुके थे|

न जाने हमारे कॉलेज के स्पोर्ट्स टीचर ने हम में क्या देखा कि क्रिकेट खेलने की सलाह दे डाली और ट्रेनिंग पर आने का आदेश भी दे दिया|

हमारे तो पसीने छूटने लगे, बड़ी मिन्नत की कि हमें क्षमा करें, परन्तु बक्षी साहिब ने हमारी जान न बक्षी|

ट्रेनिंग के पहले दिन बल्ला हाथ में पकड़ने से ऐसे घबराहट हो रही थी जैसे हाथ में साँप आ गया हो|

कोच ने बल्ले को कैसे पकडना है, कैसे विक्ट को बचाने की पोज़ीशन लेनी चाहिए आदि आदि के सुझाव दिए, और बौलिंग कैसे करनी है, इस के बारे में भी बताया | पर यहाँ सुन कौन रहा था, टांगे काँप रही थीं और दिल धक धक कर रहा था | हमें पूरा विशवास हो चला था कि बक्षी साहिब ने जरूर कोई पिछले जन्म का बदला लेने के लिये हमें टीम में लिया था |

इस के बाद करीब एक घंटा ट्रेनिंग सेशन चला और अगले हफ्ते दूसरे कॉलेज के साथ मैच वाली टीम में हमें शामिल कर लिया गया|

हमारी टीम ने बैटिंग शुरू की और पहले ही ओवर में दो खिलाड़ी आऊट हो गये और फिर हमें भेजा गया | हम अपने आप को क़ुर्बानी के बकरे की तरह समझ चुके थे, इसलिए जा कर डट गये|

गेंद बाज़ ने गेंद डाली जो सीधी हमारी ओर आ रही थी, इस डर से कि कही टांग पर चोट न लग जाये, हम उछल कर एक साईड में हो गये और बाल ‘किल्ल्यों’ (विकटों) को उखाड ले गई|

लेकिन अम्पायर ने आउट नहीं दिया क्योंकि ‘नो बाल’ था|

हमारी जान में जान आई |

दूसरी बाल के आते ही हम ने बल्ला उठा उसे रोकने की कोशिश की और कामयाब हो गये, पर दौड़ने का स्कोप नहीं था|

तीसरे बाल के आते ही हम ने बल्ला ज़ोर से घुमाया, और बाल विक्ट कीपर के सिर से लग कर  बाउंड्री की ओर तेज़ी से गई और  हमारा तुक्का, चौका बन गया|

हमारे कॉलेज वाले खुशी से झूम उठे |

अगला बाल काफ़ी तेज़ी से आया और हम ने  जैसे कबूतर बिल्ली को देख आँखें बंद कर लेता है, वैसे ही हम ने  आँखें बंद कर बल्ला उठा दिया, और बाल सीधा अम्पायर के हैट से जा टकराया | हम घबराए कि कहीं गुस्से में आउट ही न कर दें, जा कर माफी माँगी|

कुछ देर शान्ति रही क्योंकि अब दूसरे बल्लेबाज़ की ओर बाल जा रहे थे थे, उस ने ५, ६ रन जोड़े|

अगले ओवर में फिर हमारी शामत आई| तीन चार बाल और हम कोई भी रन नहीं ले सके|

कुछ एक और ओवर लिये, स्कोर कुछ बढने लगा”

‘कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना’ वाली बात हुई अगले बाल पर, हम ने सोच था कि छक्का लगाएंगे परन्तु बाल सीधा विक्ट कीपर के हाथों में और हम चल दिए ‘पैविलयन’ की ओर|

हमारी टीम ९८ रन पर निपट गई जिस में हमारे १२  रन भी थे |

अब  हमारी टीम मैदान में  उतरी गेंदबाजी और फील्डिंग करने|

हमारा तजुर्बा तो आप जान ही चुके हैं, कुछ ही दिनों का था , उस में तो  हमें क्रिकेट की भाषा का भी पूरी तरह से ज्ञान नहीं हुआ था| ‘लेग साईड’ और ‘आफ साईड’ या फिर ‘गुगली’. किस बला का नाम है, हमारे पल्ले तो कुछ पड़ा नहीं था, पर

यह बताया गया था कि बाल को हाथ की हथेली में ऐसे पकडें कि उस की सीम सीधी हो और फिर दो उँगलियों से उसे पोजीशन कर छोड़ते समय कलाई को घुमा दें ताकि बाल पिच पर गिरते ही अपनी दिशा बदल ले और बल्लेबाज़ देखता ही रह जाये| कहना आसान था, जैसे किसी को तैरने के लिये भाषण देकर पानी में उतार दिया जाये तो उस की क्या हालत होगी, गोते ही तो आयेंगे|

हमारे गेंदबाजों ने धावा  बोला और सामने वालों को दबाने की कोशिश की, पर वे धडाधड रन बनाने लगे|

नए बौलर को ट्राई करने के लिये कप्तान ने गेंद हमारे हाथ में थमा दी| आप हमारी हालत का अंदाजा नहीं लगा सकते, हाथ पाँव फूलने लगे जैसे हमें युद्ध के मैदान में भेजा जा रहा हो|

जैसे तैसे करके, हम ने पहला बाल फैंका| हमें बड़ी हैरानी हुई, क्योंकि हम ने तो उसे सीध बैटसमैन की ओर भेजा था, पर वह कुछ कदम पहले ही बायें को मुड गया और बैटसमैन के लिये उसे हिट करना मुश्किल हो गया|

बाल बीच में से निकल stumps पर जा लगा और हमारी टीम में खुशी की लहर दौड़ गई और हमारी पीठ थपथपाई जाने लगी|

‘First time lucky’ वाली बातबात थी|

उस के पश्चात, हमारी कोई न चली, रन खूब जाने लगे| हमें फील्डिंग के लिये बाउंड्री के पास भेज दिया गया|

कुछ गेंदें रोकीं पर २, ३ कैच ड्राप हो गये और अब हम हीरो से ज़ीरो बन गये| सब लोग गाली निकालने लगे|

“उन से पैसा लिया है क्या?”

“क्या कॉलेज बदलने का इरादा है?”

खैर, हमारे बौलरज़ ने काफ़ी अच्छा कंट्रोल कर लिया और दूसरी टीम की ९ विक्ट चटका दीं|

पर स्थिति बड़ी गंभीर थी क्योंकि उन्हें जीतने के लिये केवल ४ रन की आवश्कता थी|

हमारे गेंदबाज़ ने बाल किया और उन के बल्लेबाज़ ने बाल को ज़ोर का हिट किया और वह चौके की शक्ल में उधर आ रहा था जहां हम परेशान से खड़े थे| हमें लगा कि यह तो हमारी जान ले लेगा|

बदहवासी में हम ने उसे पकड़ने के लिये हाथ बढ़ाया, लेकिन गेंद हमारी नाक पर लगी और खून की धारा निकल पड़ी|

परन्तु एक अचंभा यह हुआ कि किसी तरह से हमारे हाथों ने उस बाल को नाक से हिलने नहीं दिया और कस कर पकड़ लिया|

बस फिर क्या था, इतना शोर मचा कि कानों के पर्दे तक फटने लगे | हमें कंधों पर उठाये हमारे साथी खुशी से पागल हो रहे थे | किसी को हमारे नाक की चिंता नहीं थी|

बस खुशी इस बात की थी कि  हमारे कॉलेज की नाक नहीं कटी|

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Posted by on Mar 27 2015. Filed under Community, Featured, Hindi, Humour, Sport. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. Both comments and pings are currently closed.

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