बुढ़ापे के झमेले …

old men

संतराम बजाज

“क्या लेंगे, गुप्ता जी? मैं ने गुप्ता जी को घर के अंदर आते ही पूछा|

“एक ‘ग्लुकोसोमिन’ हो तो दे दो”

“क्यों, क्या हुआ?”

“मेरी कई दिन से खत्म हो गई है और घुटने फिर से तंग करने लगे हैं| बेटे से कहा था, वह बोला अगले सप्ताह ‘सुपर कैमिस्ट’ की सेल लगे गी तो ६०% डिस्काउंट मिलेगा, तब ले आयेंगे|”

“बात तो ठीक है, ये दवाईयां तो कमर तोड़ रही हैं| मेरी तो समझ में नहीं आता कि ये लोग इतनी महंगी क्यों बेचते हैं| सरकार भी इन को नहीं पूछती कि जब ६०-७० % छूट नहीं देते तो क्या लोगों को लूट रहे होते हैं?”

“ठीक कहा आप ने, और फिर एक दवाई तो है नहीं | शरीर के सब पुर्जे ढीले पड़ रहे हैं, सब दवाईयों की बेसाखी के सहारे हैं| केवल दवाईयां ही नहीं, विटामिन,  हैल्थ सप्लीमेत्ट्स, एंटीओक्सिडेंटस , फिश ऑइल, क्रिल ऑइल, स्वामी रामदेव की आयुर्वेदिक नेचरुल… आदि आदि न जाने क्या क्या|”

गुप्ता जी बीमारियों और उन की दवाईयों के नामों का इतना ज्ञान रखते हैं कि हम ‘गूगल’ की बजाये उन्हें कंसल्ट करते हैं|

“और कौन सी रिसर्च की है आप ने बीमारियों और दवाईयों की?” मैं ने पूछा|

“अजी कैसी  रिसर्च? किस  किस का हिसाब रखें| पहले   cholesterol के लिये Lipitor लेते थे, वह कब्जी करती थी तो Crestor लिख दी डॉक्टर साहिब नेI लेकिन यह जोड़ों में दर्द करती है| अब डॉक्टर कहते हैं कि हार्ट अटैक से बचना है तो जोड़ों का दर्द तो सहना ही पड़ेगा| हर द्वाई के कुछ न कुछ side effects  होते हैं| और फिर किया भी क्या जाये जब नए तथ्य सामने आते हैं तो डॉक्टर भी अपनी सलाह बदलते रहते हैं|

अभी कल ही फिश ऑइल पर फतवा आया है कि इस के बनाने का तरीका इसे हानिकारक बना रहा है|”

“गुप्ता जी, मैं तो फिश ऑइल के सैंकड़ों कैपसूल खा चुका हूँ और कल ही ५, ६ डिब्बी सेल में  ख़रीद कर लाया हूँ| मुझे तो पिछली बार मेरे  स्पेशलिस्ट ने भी यूज़ करने को कहा था|”

“और ये specialists ! ये भी  X-ray, ultra sound ,MRI, Blood  test के बिना कुछ नहीँ करते| अभी पिछले हफ्ते मेरे Ophthalmologist (आँखों के डॉक्टर ) ने बताया कि मेरी आँखों में ’ग्लोकोमा’ है और उस का कोई इलाज नहीं पर जिस हिसाब से वह बढ़ रहा है मुझे 104 वर्ष की आयु तक फ़िक्र करने की ज़रूरत नहीं है|”

“अजी वाह ! फिर तो आप को उस का धन्यवाद करना चाहिए, लम्बी उम्र देने के लिये,” हम ने कहा |

पर गुप्ता जी को इस से कोई खुशी नहीं हुई और बोले, “इन की फीसें भी देखो, Medicare  आधी ही वापस करता है| क्या करें, जान है तो जहान है, सरकार के भरोसे कब तक बैठे रहेंगे|”

“शुक्र करो Medicare कुछ तो दे रही है, घर में जब plumber या  electrician को बुलाते हैं तो केवल दर्शन देने के ही वे एक सौ डालर से ऊपर लेते हैं और बाकी पार्ट्स के अलग| देते हैं न अपनी जेब से ?”

“अजी एक झमेला हो  तो  बात करें, यहाँ तो दवाईयों के साथ साथ खाने और exercise की भी समस्यायें हैं| अब बूढ़े शरीर में चलने तक की शक्ति तो रही नहीं और ये कहते हैं कि कम से कम आधा घंटा प्रति दिन सैर करो, योगा करो | खाने में न मीठा न चटपटा और न ही चिकना,  क्या बेस्वादी भोजन बना दिया है |”

“पर उन की बात न मानी तो ’मधु रोग ’ अर्थात  diabetes या फिर हार्ट और बीपी  जैसी बीमारियां| गुप्ता जी आजकल तो  जानवर और परिंदे भी सोच समझ कर खाते हैं, बिस्किट की बजाये प्लेन ब्रेड ज़्यादा पसंद करते हैं|”

गुप्ता जी भी शायद उकता गये थे बीमारियों की बातों से, कुछ  सीरियस हो गये|धीमी आवाज़ में बोले, “खैर छोड़िये, मैं एक और सिलसिले में आप की राय लेने आया था|”

“क्या बहू से फिर कुछ कहा सुनी हो गई? आप बिला झिझक कहिये”

“नहीं नहीं, उस फ्रंट पर आजकल शान्ति है, वह पोता पोती के कारण|”

“क्या मतलब?”

“उन की भी आजकल अपनी माँ से नहीं बनती, तो हम एक पार्टी में हैं|”

“अच्छा, वह जो कहते हैं ना, दुश्मन का दुश्मन दोस्त|”

“कुछ ऐसा ही समझ लो,” और गुप्ता जी हंसने लगे|

फिर गंभीर हो कर बोले, मुझे तो कल की दो एक फोन कॉलों ने परेशान कर रखा है”

“कैसे फोन कॉल? क्या दाऊद इब्राहिम फ्रौती मांग रहे हैं? हम ने मज़ाक किया|

 

“नहीं, बजाज साहिब नहीं, यह कॉल एक फ्यूनरिल कंपनी की थीं, कह रहे थे इस महीने १०% डिस्काउंट है और यदि हम ने इस का लाभ उठाना है तो तुरुन्त बीमा करा लें ”

“तो इस में घबराने की क्या बात है, मुझे भी आती रहती है ऐसी कॉलें| और हर रोज़ सवेरे सवेरे ही, जब हम ने नाश्ता तक नहीं किया होता, टीवी पर वे ये संदेश देते रहते हैं कि हम अपने  बच्चों पर अपने  आख़िरी सफ़र  का भार न डालें और बीमा करा लें|”

“यह बड़े अपशगुन की बात है कि हम अपने  को ज़िंदा न रख, मरने की बातें सोचें| मुझे तो ऐसे लगा कि यदि एक महीन के अंदर बीमा नहीँ कराया तो पता नहीं क्या होगा?

“अरे गुप्ता जी, आप ने कल वह टीवी पर जापान के बारे में प्रोग्राम नहीं देखा क्या?

“कैसा प्रोग्राम?”

“जापान में बड़े बड़े शौपपिंग सेंटर्स में कई कम्पनियों की ओर से seminar आयोजित किये जा रहें है, जिस में ‘आप कैसे मरना पसंद करेंगे’, ‘जीवन के आख़िरी सफर की तैयारी में आप स्वयं फैसला करें’, आदि के विषयों  पर बातें बताई जा रही हैं|

“कैसी बेहूदा बातें हैं| कैसे मरना है यह कोई हमारे हाथ में है क्या?

मैं तो सच बताऊँ, आजकल ’डिमेंशिया’ से बहुत डरता हूँ,  उस में  तो व्यक्ति ज़िंदा लाश बन के रह जाता है| भगवान से यही प्रार्थना करता हूँ कि  बिस्तर  न पकड़वाय,  बस चलते  फिरते में ही उठा ले|”

“नहीं, नहीं आप समझे नहीं; वे इस तरह के फैसले की बात नहीं कर रहे ,वे तो मरने के बाद की तैयारी के बारे में कह रहे हैं|

वहाँ पर तरह तरह के कफन रखे गये हैं और लोग उन में लेट कर यह देख रहे थे कि कैसे ‘फील’ होता है जब आदमी मर जाता है| एक औरत तो इतनी खुश दिखाई दे रही थी कि कितने आराम वाला कफन था और कि अब वह  तसल्ली से मर सकती है|”

“कमाल के लोग हैं, मौत का मज़ाक उड़ा रहे हैं, उन्हें डर नहीं लगता “, गुप्ता जी बोले|

“क्या डरने से मौत नहीं आयेगी? और फिर उन की बातें सोचने लाईक हैं| उन का कहना है कि क्यों पीछे बच्चों के लिये समस्या छोड़ जायें| हो सकता है कि पैसा बचाने के लिये, या आपसी झगड़ों के कारण वे आप की आख़री रस्में ठीक ढंग से न कर पायें तो आप को कैसा लगेगा”

“कैसा लगेगा, अजीब बात है! जब मर गये तो क्या फ़र्क पड़ता है?”, गुप्ता जी बोले|

“उन का कहना है कि अपने जीते जी यह भी देख लें कि आप किस प्रकार की अंतिम व्यवस्था चाहेंगे | कैसे कपड़े, कौन सी फ़ोटो और  Eulogy अर्थात वह  भाषण-जो मरने वाले के  बारे में किया जाता है, ये तो पूरा package आफर कर रहे हैं|

जैसे  हम पंडित बुलाते हैं ना, आख़री रस्मों के लिये! कई बार बड़ी भाग दौड़ करनी पड़ती है पंडित ढूँढने में| क्योंकि हमारे पंडितों में भी छूआ छूत या status के कारण आम पूजा कराने वाला  पंडित मरने वाले की  आख़िरी रस्में नहीं कराता|

तो ये जापानी लोग यदि सब कुछ पहले कर रहे हैं तो इस में क्या बुराई है|”

“मैं बुराई नहीं कहा रहा, बस इतने ताम-झाम की क्या ज़रूरत है,” गुप्ता जी उकताए हुए लग रहे थे| पर मैं बोलता ही गया|

“और तो और, मरने वाले की अस्थियां किस प्रकार से रखनी हैं| वहाँ हमारी तरह ही मरने के बाद जलाते तो हैं पर अस्थियां पानी में कम ही बहाते हैं| उन्हें मंदिरों आदि पवित्र स्थानों पर छोटे छोटे बक्सों में बन्द कर रख लेते हैं| उस के लिये आजकल की संस्थाएं बड़ी ‘हाईटैक’ तरीके इस्तेमाल करने लगी हैं| जगह की कमी के कारण, बक्से एक के ऊपर एक, जैसे बैंक लॉकर होते हैं, रखे जाते हैं| आप के रिश्तेदार जब देखना चाहें, ID Card  द्वारा प्रवेश कर एक बटन दबायें, बक्से के बाहर रौशनी होगी और बक्सा नीचे जहां आप के रिश्तेदार खड़े हैं, उन के पास पहुंच जाएगा|”

“अच्छा यदि ये मुर्दों की बातें समाप्त हो गई हों तो, ज़िंदा लोगों की बातें करें,” गुप्ता जी काफ़ी झल्ला गये थे|

“हाँ, हाँ, क्यों नहीं, बड़े शौक़ से! तो बताईये?”

“वह मेरी ग्लुकोसोमिन का क्या हुआ?”

“ओह माफ़ करना, आप ने बातों में ऐसा उलझा दिया कि मैं भूल ही गया| क्या करू, मैं तो खुद इस भूलने से बड़ा परेशान हूँ”

“इस से पहले कि आप पर फिर भूलने का दौरा पड़े मुझे मेरी गोली दे दीजिए और साथ में एक गिलास पानी का  भी,” और हम हंसने लगे|

 

 

 

 

 

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Posted by on Apr 2 2015. Filed under Community, Featured, Hindi, Humour. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. Both comments and pings are currently closed.

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