ज़िन्दगी चलती रही रफ़्तार से…

 

– रेखा राजवंशी
ज़िन्दगी चलती रही रफ़्तार से
गम, ख़ुशी से, जीत से या हार से
.
ले के पत्थर जेब में फिरते रहे
सामने मिलते रहे वो प्यार से
.
कागज़ी कश्ती में बैठे लोग थे
क्या सुलह करते किसी पतवार से
.
आसमाँ के चाँद की क्या सोचते
जो परीशाँ भूख से और बीमार से
.
ज़ख्म भर पाते कहाँ जब दोस्त ही
चुभ रहे थे रास्तों के खार से
.
देखिये उनकी भी ये दीवानगी
गुल भी लाए तो किसी मज़ार से

इस ज़मीं को बहुत बारिश चाहिए
कुछ न होगा एक दो बौछार से
.
कौन सी शबनम तलाशेंगे यहाँ
जो हथेली पर टिके इसरार से
.
खूबसूरत अब भला किसको कहें
लग रहे सब लोग इश्तेहार से

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Posted by on Jul 11 2015. Filed under Hindi. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. Both comments and pings are currently closed.

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