विश्व रंग भोपाल – वैश्विक साहित्य और कला का संगम

रेखा राजवंशी 

सात से दस नवम्बर तक आयोजित टैगोर अंतर्राष्ट्रीय साहित्य और कला महोत्सव आयोजित किया गया था, जिसमें प्रतिभागी के रूप में मुझे भी आमंत्रित किया गया था। इस भव्य आयोजन का श्रेय टैगोर विश्वविद्यालय के कुलपति व उत्सव  निर्देशक संतोष चौबे जी व उनकी टीम को जाता है जिन्होंने बड़ी कुशलता से समस्त कार्यक्रम का आयोजन किया था। यह कार्यक्रम रविन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय और आईसेक्ट विश्विद्यालय समूह द्वारा आयोजित किया गया था। इसमें अन्य संस्थाओं ने भी सहयोग दिया था ।

विश्वरंग कार्यक्रम में करीब पांच सौ हिंदी साहित्यकारों, शिक्षकों और कलाकारों को आमंत्रित किया गया था।

यह ऐसा उत्सव था, जिसने मुझे  विश्व भर के लेखकों, कवियों, कलाकारों से जुड़ने का अवसर तो प्रदान किया ही बल्कि, भारतीय संगीत, चित्र कला और शिल्प को देखने व अनुभव करने का अवसर भी प्रदान किया।  प्रवासी कवियों के आने जाने, उनको एयरपोर्ट से होटल तक लाने, छोड़ने की व्यवस्था से लेकर खान-पान और मनोरंजन तक सबका पूरा ध्यान रखा गया था। पूरे कार्यक्रम की विशेषता थी कि समस्त कार्यकर्त्ता विनम्र और शालीन थे।  

छह नवम्बर की रात जब हम भोपाल हवाइअड्डे से बाहर निकले तो खूबसूरत गुलाब से सबका स्वागत किया गया। भोपाल के ताल तो मशहूर हैं ही परन्तु वहां के लोगों का सभ्यता और संस्कृति के प्रति रुझान भी क़ाबिले-तारीफ है। होटल की लॉबी में गेंदे के फूलों सजे दीपदान की शोभा ने बरबस अपनी ओर खींच लिया। विश्व रंग का बैनर भी आकर्षक लगा।  

अगले दिन सात नवम्बर को सभी प्रवासी साहित्यकारों को कुलपति संतोष चौबे जी के रविंद्रनाथ टैगोर विश्व विद्यालय  जाने का अवसर मिला। यह विश्वविद्यालय वर्तमान में करीब पांच हजार विद्यार्थियों को अपने सपने साकार करने का अवसर दे रहा है।  विश्वविद्यालय में नौ विभाग हैं जिनमे एग्रीकल्चर, कंप्यूटर व आई टी, कानूनी अध्ययन, कॉमर्स, इंजीनियरिंग, कला, एजुकेशन, मीडिया, फारमेडिकल, साइंस और नर्सिंग शामिल हैं।  विद्यार्थियों के लिए आवास की व्यवस्था भी है। परिसर में अनेक आधुनिक सुविधाएं भी उपलब्ध हैं।  

अपराह्न कार्यक्रम स्थल मिंटो भवन पहुंची तो दूर से शहनाई वादन की मधुर ध्वनि ने मन को उल्लास से भर दिया, मिंटो भवन के सजे हुए दालान में पहुँच कर ऐसा लगा कि सरस्वती स्वयं वहां विराज गई हों। एक तरफ पुस्तकों का पिरामिड सबको लुभा रहा था तो दूसरी तरफ आर्मी बैंड द्वारा समूह गान के अलावा जालियां वाला बाग़ प्रदर्शनी का भी उद्घाटन हो रहा था। स्वस्ति गान और दीप प्रज्वलन के बाद कथादेश का लोकार्पण हुआ। 18 खंडों में प्रकाशित कथा देश दो सौ वर्षों की कथा परंपरा एवं लगभग 600 रचनाकारों को समेटे है ।

अगले दिन के कार्यक्रम में लोकप्रिय गायक गुंदेचा ब्रदर्स के ध्रुपद गायन ने मन मुग्ध कर लिया। मिंटो भवन के प्रांगण में मध्य प्रदेश के पारम्परिक नृत्य संगीत की छटा बिखरी हुई थी। कहीं मुखौटा प्रदर्शनी चल रही थी  तो कहीं चित्र प्रदर्शनी के रंग सबको आकर्षित कर रहे थे। मिंटो भवन के भीतर कला व साहित्य प्रेमियों का जमघट था, जो बड़े मनोयोग से आयोजित कार्यक्रमों का रसास्वादन कर रहा था। शाम को आयोजित कवि सम्मेलन का भी सबने भरपूर आनंद उठाया। प्रवासी कहानी और उपन्यास लेखन के विविध पहलुओं पर चर्चा की गई थी।  प्रवासी कवियों के कवि सम्मलेन  का भी एक सत्र था, जिसमें श्रोताओं ने यूरोप, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के कवियों की कविताओं का रसास्वादन किया।  

नौ नवम्बर को भी अनेक विचार परक सत्र आयोजित किये गए थे, जिनमें थर्ड जेंडर की कविताओं ने मन मोह लिया। 

नौ नवम्बर को ही तीन बजे पब्लिक रिलेशन्स सोसाइटी भोपाल द्वारा प्रवासी साहित्यकारों के सम्मान का आयोजन था।   इस कार्यक्रम में मेरे साथ दो अन्य साहित्यकार भावना कुंवर तथा संजय अग्निहोत्री भी आमंत्रित थे।  सभी के साथ मुझे भी पुष्पगुच्छ,  शॉल, नारियल व् ट्रॉफी देकर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर मध्य प्रदेश के सांसद व मंत्री श्री बृजेंद्र सिंह राठौर द्वारा पांच पुस्तकों का विमोचन भी किया गया, जिनमें मेरे संपादन में प्रकाशित  ऑस्ट्रेलिया के चालीस हिंदी कवियों के काव्य संकलन ‘बूमरैंग-२, ऑस्ट्रेलिया से कविताएँ’ भी सम्मिलित थी।  

मिंटो हॉल के एक कोने में विविध प्रकाशकों और पत्रिकाओं के स्टाल भी थे, जिनमे से दो की हिंदी के प्रति निष्ठा और कर्मठता से मैं पूर्व परिचित थी।  पहला गर्भनाल के सम्पादक आत्माराम जी का स्टाल, जो गर्भनाल को टेक्नोलॉजी से जोड़कर अनेक नए प्रयोग कर रहे हैं और दूसरे जवाहर कर्णावट जी, जिन्होंने बड़ी लगन से विश्व भर का अनेकों वर्षों का हिंदी साहित्य सहेजा है।  

दिन में चलने वाले कार्यक्रमों के बाद होटल पलाश में देर रात जागकर अन्य प्रवासी साहित्यकारों के साथ विचारों का आदान-प्रदान करना और कविता और गानों द्वारा मनोरंजन करना भी अविस्मरणीय रहेगा।  

इस भव्य और विशाल आयोजन के पीछे अथाह श्रम और पैसा खर्च हुआ होगा।  प्रवासी साहित्यकार होने के नाते यही कहूँगी कि इस महोत्सव ने वैश्विक स्थल पर न सिर्फ साहित्यकारों को जोड़ा बल्कि उन्हें भारत के दिग्गज रचनाकारों से जुड़ने का अवसर भी दिया।विश्व रंग महोत्सव ने भारतीय कला और साहित्य के इतिहास में सुनहरे अक्षरों से लिखा एक ऐसा पृष्ठ जोड़ दिया है, जिसे भविष्य की अनेक पीढ़ियां याद रखेंगी। इस महोत्सव ने प्रवासी रचनाकारों को एक नई ऊर्जा व स्फूर्ति से भर दिया, इस बात में संदेह नहीं कि उनके लेखन में इस उत्सव के कारण नए आयाम जुड़ेंगे और इस साहित्य मंथन से कुछ ऐसा निकलेगा जो सबको अमरत्व प्रदान करेगा। 

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Posted by on Jan 2 2020. Filed under Books, Community, Featured, Hindi. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. Both comments and pings are currently closed.

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