बोर हो रहे हैं हम!
संतराम बजाज
पिछले कुछ दिनों से अजीब सी बोरियत छाई हुई है| भारत के टीवी वालों को जैसे सांप सूंघ गया है| सब चटपटी खबरें गायब सी हो गई हैं|कुछ तो तरस करो यारो, हम खाली बैठ कर क्या करेंगें, हम समय कैसे काटें?
शायद उन का भी कसूर नहीं है | वे बेचारे क्या करें?
दिल्ली इलेक्शन समाप्त| केजरीवाल ने फिर से वह झाडू फेरा है कि सब कचरा साफ़ कर दिया|भाजपा सुन्न है और कोंग्रेस में मरघट वाली खामोशी| अब एक दूसरे पर बेमतलब के इलज़ाम नहीं लग रहे हैं, यहाँ तक कि कुम्भ के मेले में बिछुड़े हुए भाई मिल गए हैं|
कश्मीर का 370 का मसला करीब करीब ख़त्म है अर्थात भूतकाल में चला गया है| बाप बेटा अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती जैसी हस्तियाँ अभी कुछ बोलने के योग्य ही नहीं हैं|कोई नये इंटरव्यू नहीं, कोई नये धमाके नहीं|
उधर अयोध्या में राम- राज्य आने वाला है, इसलिए संतुष्टि है|
JNU और जामिया-मिल्या-इस्लामिया दिल्ली को पुलिस ने दबा के रखा है, उन के वीडयो और ‘फेक वीडयो’ के मध्य में सब कन्फ्यूज्ड हैं|स्टूडेंट्स के वीडियो पुलिस की बर्बरता दिखाते हैं कि वे निहत्ते और अपनी किताबों में व्यस्त विद्यार्थियों पर लाठिया बरसा रहे हैं जबकि पुलिस वाले उन्हें पत्थर मारने के बाद लाइब्रेरी में घुस कर पढने का नाटक करने वाले बताते हैं|
न पाकिस्तान से लड़ाई और न ही आलू प्याज की महंगाई की बातें – वे तो चुनावों के समय में ही की जाती हैं|
बिहार और बंगाल के चुनावों में अभी कुछ देरी है| (वैसे वहां कुछ आशा की किरन नज़र आती है)|
CAA और NRC को ले मामला अभी ठंडा तो नहीं हुआ पर ‘शाहीन बाग़’ वाले भी थक गए हैं और उसे अब सुप्रीम कोर्ट देखेगी|हालांकि उवेसी की पार्टी के कुछ व्यक्ति बड़ी अजीबोग़रीब बयानबाजी कर रहे हैं, जिस से हिन्दू मुस्लिम एकता को धक्का पहुँच रहा है|एक लडकी ने तो ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारे तक लगा डाले|
लेकिन इस एक टॉपिक पर तो टीवी वालों की भी रोजी नहीं चल सकती!
तो बाक़ी टीवी वालों के मतलब की बात बची नहीं | ले दे के ‘कोरोनावायरस’ बचा है, उस पर क्या राजनीति करें और क्या दंगल? न ही यह भारत का मसला है और फिर अभी तक तो उस ने भारत पर करूणा ही दिखाई है, तो इस में कुछ मिलेगा नहीं इन्हें|
तो ऐसे में वे भी मजबूर हैं – करें तो क्या करें?
हाँ, कुछ एक टीवी वाले- मोदी जी के विरोधी या उन के पक्के भक्त- अपने अपने राग अलापते रहते हैं, जिन्हें सुन सुन कर हमारे कान पाक गए हैं, इसलिए उन्हें सुनते नहीं हैं|
समाचार पत्रों में फिर भी कुछ न कुछ ढंग का मिल जाता है,नहीं तो बस तोबा ही भली!
भारत में तो लोगों के पास मनोरंजन के और बड़े साधन हैं,पर हम प्रवासी भारतीयों के पास तो ज्यादा साधन हैं नहीं|यहाँ की राजनीति में कोई दम नहीं है, बेरस ख़बरें सुन कर न तो खून उबलता है और न गाली निकलती है मुंह से और न ही हंसी आती है|मिनिस्टर तक को नौकरी से हाथ धोना पड़ गया क्योंकि उस ने एक कल्ब को कुछ हज़ार डॉलर की ग्रांट दे दी थी – वह इसलिए कि वह उस कल्ब की मेंबर थी|क्या आप भारत में इस की कल्पना भी कर सकते हैं?
इसलिए बिलकुल मज़ा नहीं आ रहा|
यहाँ सिद्धु या राहुल गांधी जैसे स्पीकर कहाँ? जिनकी हर बात पर मीडिया वाले कुछ मिर्च मसाला लगा कर हम जैसी जनता का मनोरंजन करते रहे हैं | परन्तु आजकल सिद्धु भी शायद संन्यास ले चुके हैं और राहुल जी शायद इटली छुटियाँ मनाने या नानी से मिलने गए हैं| न ही राहुल-मोदी की जप्फी देखने को मिलती है और न ही संसद में वह गाली गलोच|
ऐसे में हम क्या करें?
दूसरे देशों के समाचार भी ठंडे हैं| अमेरिका में TRUMP की इम्पीचमेंट नहीं हुई, इग्लेंड में हैरी और मीघन महल छोड़ चुके हैं | हाँ अब ट्रंप भारत आ रहे हैं अपने सारे परिवार के साथ और उन के स्वागत में ‘नमस्ते ट्रंप’ पर १०० करोड़ रूपये खर्च किये जा रहे हैं| इस पर बड़ी दबी दबी आवाज़ में कुछ लोग बोल अवश्य रहे हैं|
पर न कोई हंगामा है और न कोई धमाका – बस चारों ओर शान्ति ही शान्ति !
चलिये इन्तजार करते हैं … जब तक अच्छे दिन आते हैं|
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