क़यामत से कयामत तक…

संतराम बजाज

इंद्रलोक में चारों ओर कोहराम मच गया। देवताओं में खलबली ओर घबराहट का माहौल छा गया, जब नारद जी “नारायण ! नारायण !!” कहते पधारे और सूचना दी कि ब्रह्मा जी ने आपातकालीन (Emergency) मीटिंग बुलाई है।  क्या हो सकता है, किसी को कुछ पता नहीं।

भगवान् विष्णु और भगवान् शंकर तो पहले ही से वहां मौजूद थे।  न जाने तीनों में क्या बातें हुई कि ब्रह्मा जी को ये कदम उठाना पड़ा।  नारद जी भी जो आम तौर पर शरारती मुद्रा में रहते हैं, आज बड़ी चिंतित मुद्रा में दिख रहे थे।

भगवान् विष्णु  ने सबको सम्बोधित करते हुए कहना शुरू किया, “पृथ्वी पर हालात बड़े बेकाबू हो  रहे हैं, पाप के मटके भरते ही जा रहे हैं और हर बार की तरह मुझे अवतार धार कर पृथ्वी पर जाने को कहा जा रहा है जबकि agreement के हिसाब से मेरा दसवां अवतार लेने का समय कलयुग के ख़तम होने के पश्चात होना है।  पर सच बात तो ये है कि अब मैं बहुत थक गया हूँ और मेरे बस का अब ये रोग नहीं है, मैं अब इस झमेले में पड़ना नहीं चाहता, इसलिए बहुत सोच विचार के बाद मेने अपना त्यागपत्र ब्रह्मा जी को सौंप दिया है।

सब लोग सन्नाटे में थे। धरती माँ के तो आंसू थमते ही नहीं थे।  उन्हें तो जैसे ‘सुप्रीम कोर्ट’ ने फांसी की सजा सुना दी हो।

सब देवी देवताओं ने भगवान् को मनाने की बहुत कोशिश की, रो रो कर, गिड़गिड़ा कर उन्हें अपना त्यागपत्र वापिस लेने की प्रार्थना की, परन्तु विष्णु जी टस से मस न हुए।  आखिर थक हार कर, ब्रह्मा जी ने पृथ्वी की ‘use by date’ तय कर दी।

“आज से चार सप्ताह बाद, शंकर जी अपनी ‘तीसरी आँख’ खोलेंगे और धरती पर प्रलय का, विनाश का प्रारम्भ होगा, जो पूरे पांच दिन चलेगा और फिर वहां की हर चीज़ नष्ट हो जायेगी।  जहाँ पहाड़ है, वहां नदियां और सागर होंगे, पानी की जगह पहाड़ और चट्टानें नज़र आएँगी और कोई प्राणी जीवित नहीं रहेगा, यहाँ तक कि पेड़ पौधे भी सूख कर ख़तम हो जाएंगे।  नयी सृष्टि कब और कैसे रचनी है, उसका निर्णय फिर कभी लिया जाएगा।  अब आप लोग जा सकते हैं।”

कोई जाना नहीं चाहता था लेकिन फैसला अटल है, ये सब जानते थे, इसलिए मीटिंग समाप्त कर दुःखी मन से अपने अपने निवास स्थानों पर चल दिए।

सीन बदलता है, चलिए पृथ्वीलोक की खबर लें, वहां इस खबर का क्या असर पड़ा है।

“बजाज साहिब सुना आपने ?”, गुप्ताजी हाँफते हुए हमारे सामने खड़े थे।

“क्यों क्या हुआ? आप इतने घबराये हुए क्यों हैं ?” हमने पूछा।

“बात ही कुछ ऐसी है, अभी अभी जगत गुरु शंकराचार्य जी का टीवी पर व्याख्यान आया है कि दुनिया चार हफ़्तों में ख़तम हो जाएगी।”

“क्या मतलब ख़तम हो जाएगी ? हमने वजाहत (clarifcation ) चाही।  “मतलब ये की प्रलय आ जायेगी, कयामत का दिन फिक्स हो गया है, केवल चार सप्ताह और रह गए हैं।

“किस ने किया है ये फिक्स, शंकराचर्या यह कैसे कर सकते हैं, वह कोई भगवान् तो  हैं नहीं, आप इतने यकीन के साथ कैसे कह सकते हैं ? हमने एक साथ कई सवाल कर डाले।

“ठीक है, वह भगवान् तो नहीं हैं, पर भगवान् के साथ उनका डायरेक्ट connection तो ज़रूर है।  अभी तक उनकी हर भविष्यवाणी सच ही निकलती आ रही है।  और इस बार तो उन्होंने ब्रह्मा जी के मुख से निकली बातें ही बताई हैं।  उन्होंने  ब्रह्मलोक में हुई मीटिंग का आँखों देखा हाल भी सुनाया है।

हे राम ! अब क्या होगा ? गुप्ता जी की आवाज़ लड़खड़ा रही थी।

“होगा क्या ? सब लोग इक्कठे मरेंगे,” हम ने कहा, “कोई किसी को दफ़न नहीं करेगा और न ही कोई किसी दुसरे की चिता जलायेगा।”

“आप को मज़ाक सूझ रहा है, मेरा तो डर के मारे दम निकल रहा है, मैं अभी मरना नहीं चाहता।”

“मरने का मुझे भी कोई शौक़ नहीं है जनाब … ये अफवाहें तो आप खुद ही फैला रहे हैं,” हम ने जवाबी हमला किया।

“ये अफवाहें नहीं हैं बजाज साहिब, आप यकीन कीजिये, दुःख की बात तो ये है, केवल चार हफ्ते, मेरी रिटायरमेंट का क्या होगा, उसमे तो अभी छः महीने बचे हैं।”

“तो भगवान् से एक्सटेंशन के लिए कह देते हैं,” हम अभी भी गुप्ताजी की बात को सीरियसली नहीं ले रहे थे, “दुनिया भले कैसे ख़तम हो सकती है ? कैसी बेतुकी बात लेकर आप आये हैं, गुप्ताजी?”

“क्यों नहीं जो चीज़  बनी है,  एक न  एक दिन उसे ख़तम होना ही है, यही संसार का नियम है; थोड़ी देर के लिए गंभीरता से इस पर विचार तो कीजिये,” गुप्ताजी की आवाज़ में एक खौफ सा था जिसने मुझे भी कुछ ‘नर्वस’ सा कर दिया।

“आप कुछ वर्ष पहले आयी सुनामी को भूल गए, क्या वह प्रलय का संकेत नहीं था?”

इतने में हमारी श्रीमती जी चाय लेकर आ गयी।

हमने जब श्रीमती जी से गुप्ताजी वाली बात का ज़िक्र किया तो वह भी एकदम घबरा गयी, “अब क्या होगा ? कई दिन से कह रही हूँ की वह बीमे की किश्त भर दो, अब देखना कुछ भी नहीं मिलेगा।”

और फिर वे अपनी ही बात पर खिसिया कर बोली, “जब  सब मर ही जाएंगे तो क्या फ़र्क़ पड़ेगा, हाँ पर बिजली का बिल तो भुक्ता ही दो।”

“कमाल है, घडी में तोला घडी में मासा, बिल चुकता करने की क्या ज़रुरत है, जब लेने वाले भी साथ ही चले जायेंगे।  बल्कि मैं कहता हूँ क्यों न ढेर सारा उधर लेकर बाकि के दिन खूब ऐश की जाए।”

“ना भई  ना,  हम  सिर पर  उधर लेकर, भगवान् के सामने शर्मसार नहीं होना चाहते, इसी दुनिया का हिसाब इसी दुनिया में, और फिर अगला जनम इस जनम के आधार पर ही तो तय होगा,” हमें श्रीमती जी की इस argument में काफी वज़न लगा, पर आसानी से हार मानने वाले नही थे, “अरे किसने देखा है अगला जनम, जब सृष्टि ही नहीं रहेगी, तो जनम कहाँ और कैसे होगा?”, हमारे इस तर्क ने श्रीमती जी को थोड़ी देर के लिए चुप करा दिया, पर कुछ सोच कर फिर बोलीं, “न बाबा न, मैं भूत बन कर नहीं रहना चाहती, क्योंकि आत्मा को यदि शांति ना मिली तो भूत के रूप में घूमना पड़ेगा।  मैं तो कहती हूँ अब पंडितों को यज्ञ आदि शुरू कर देने चाहिए, पूजा पाठ से भगवान जी को मनाना चाहिए, ताकि वे इस प्रलय को टाल दें।”

“असंभव है, सब देवी देवता कोशिश कर चुके हैं, यही तो अभी गुप्ताजी ने बताया है,” हम बोले।

“यदि ब्रह्मा जी चाहते तो विषणु जी की जगह किसी और को भी तो appoint कर सकते थे।  ये तो सरासर बेइंसाफी है, धांधलेबाजी है,” यह मिसेज़ शर्मा की आवाज़ थी जो इस बीच हमारे घर पधार चुकी थीं।

करीब आधा मोहल्ला हमारे घर इक्कठा हो चुका था, बात ही कुछ ऐसी थी जो चारों और आग की तरह फैल गयी थी और सब लोग बड़े चिंतित लग रहे थे।  उधर मिसेज़ सिंह बड़ी उत्तेजित हो रही थीं, “अब देखो न, कैसे चलेगा ?  मेरे तो कई TV serials बड़े रोचक मोड़ पर हैं, ‘क्योंकि सास भी कभी बहु थी’, ‘घर घर की कहानी’, और बस चार हफ्ते ? हे वाहे  गुरु, क्या करूँ?”

“मैंने तो कल ही बीस हज़ार रुपए एडवांस देकर बेटे के reception उसे के लिए फार्महाउस बुक  किया है,” श्री बनारसी लाल दुखी स्वर में कह रहे थे।

“आप तो जानते हैं कि उसकी शादी एक NRI की बेटी के साथ हो रही है और उसके बाद उसे American Visa मिलने वाला था। सब चौपट हो जायेगा।  विष्णु जी को भी यही टाइम मिला था?।”

हम अंदर ही अंदर हंस रहे थे, “आप ठीक  कह रहें हैं, आप की तरह और भी कितने लोगों की इच्छाएं,  जैसे सोनिआ गाँधी की राहुल को प्रधान मंत्री बनाने की इच्छा,” हमने चुटकी ली।

“लेकिन अब उसे प्रधान मंत्री बन जाने का फ़ायदा ?” मिस्टर मुखर्जी ने हमें टोका।

“फ़ायदा ही फ़ायदा है, भगवान् के घर में भी तो VIP quota होगा, वहां पर राहुल जी के प्रधान मंत्री बनने की तो बात ही कुछ और होगी”।

“नहीं ऐसा नहीं हो सकता, भगवान् के घर में तो सब बराबर होते हैं,”

“अगर ये बात है तो स्वर्ग और नरक क्यों बने हैं ? सब एक ही जगह पर क्यों नहीं रहते ?”

“वहां तो हर किसी के कर्मों के अनुसार, स्थान दिया जाता है ।”

गुप्ताजी जो काफी देर से चुप बैठे हुए थे, बोले, “आप ख्वामख्वाह की बातों मे समय बर्बाद कर रहे हैं, ज़रा सोचिये।”

“क्या सोचें? अब सोचने को रह ही क्या गया है? आपके अनुसार तो सब कुछ ख़तम हो जायेगा, हाँ, एक idea है मेरे मन में, पृथ्वी को छोड़ कर चाँद या मंगल पर चला जाए, American  spacecraft पर बैठ कर अंतरिक्ष में पहुंच जाएँ तो शायद बच जाएँ ।”

हालाँकि यह बात हमने मज़ाक में कही थी, और बेतुकी होने के साथ साथ असम्भव सी थी, पर गुप्ताजी के चेहरे पर कुछ तस्सली नज़र आयी और इसे उम्मीद की किरण समझ कर वे चाय की चुस्कियां लेने लगे।

 

यह रचना संतराम जी ने 2006 में लिखी थी और आज के क्रोनोवायरस के समय पर भी पूरी तरह से लागू हो रही है।

 

 

 

 

 

 

 

 

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Posted by on Mar 28 2020. Filed under Community, Featured, Hindi, Humour. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. Both comments and pings are currently closed.

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