ये आँसू ! ….संतराम बजाज

अब आप कहेंगे कि ये क्या आँसुओं का रोना रोने आ गए| इतना सीरियस टॉपिक!

एक तो करोना पीछा नहीं छोड़ रहा है और इस ने हमें आँसू बहाने पर मजबूर कर रखा है | कोई आँसू पोंछने वाला भी नहीं मिलता, सभी तो दुखी हैं इससे, और ऊपर से आप भी आंसूओं की याद दिलाने आ गए|

मैं आप से पूछता हूँ, “क्या आप कभी नहीं रोए? आप ने आख़री बार कब आंसू बहाए थे?”

तो भैया, मैं तो कहूंगा कि भागने से मुसीबत टल नहीं जाती, उस के बारे में बात करो, उस का सामना करो|

अब आप तो जानते हैं कि अकेले बैठे बैठे पुरानी यादों में खो जाते हैं, मन भावुक हो उठता है और फिर आंखें नम हो जाती है| आँसू या अश्रु, कुछ भी कहो, या मन की भड़ास, मन के अंदर छुपा हुआ दुख, आंसू बन बाहर निकलता है, तो ऐसे में बात तो करनी ही पड़ेगी; वो जो कहते हैं ना ‘बात करने से दिल हल्का हो जाता है’ और दुख बाँटने से मन को शांति मिलती है|

इसलिए मैं क्षमा चाहता हूँ यदि इस लेख में आपको हँसने का मौका न मिले| पर आंसू बहाने पर मजबूर होना पड़े, ऐसी भी कोई बात न हो, इस का ध्यान रखूंगा|

वैसे आंसू बहाना कोई इतनी बुरी बात भी नहीं है|

आपको याद होगा जब चीन ने भारत को १९६२ की जंग में हराया था, उस से दुखी होकर कवि प्रदीप ने एक बहुत ही सुंदर गीत लिखा था जिसे लता मंगेशकर ने पंडित जवाहर-लाल नेहरू, जो उस समय प्रधानमंत्री थे, उनकी उपस्थिति में गाया था और पंडित नेहरू जी भी वह गीत सुनकर आँसुओं को रोक ना सके| उसके बोल तो आपको याद ही होंगे, “अये मेरे वतन के लोगों, ज़रा आँख में भर लो पानी, जो शहीद हुए हैं उनकी ज़रा याद करो क़ुर्बानी|”|

तो आँसुओं की बातें मन की भावनाओं से जुड़ी हुई हैं, ज़्यादातर दुःख देने वाली होती है पर कई बार ख़ुशी के आँसू बन कर भी आती हैं| आप ने देखा ही है कि जब इंसान बहुत ख़ुश होता है तो भी आँखों में आँसू आ जाते हैं|

आँसुओं को पानी कह लीजिए या इसी आँसू को मोती कह लीजिए,  यह तो सोचने वाले पर और हालात पर निर्भर करता है|

आखिर आंसू है क्या?

क्या यह आँख से निकला हुआ पानी है जैसे पसीना जिस्म से निकलता है या फिर कोई ख़ास अहमियत है इस की?

आंसू, वास्तव में दिल के अन्दर की व्यथा को बताते हैं| आंसू एक एहसास है, इंसानी जज्बों का एक हिस्सा है| आँसुओं की एक अपनी ही पहचान है अपना ही अस्तित्व है, उन का आँखों से रिश्ता तो है ही, पर दिल से उस से भी बड़ा नाता है| कई मानसिक परिस्थितियों में हमारे आंसू निकल पड़ते हैं|

खुशी और गम, दोनों ही स्थितियों में गिरते हैं|

है ना अजीब बात?

एक फ़िल्मी गीत याद आ रहा है, जो हसरत जयपुरी ने लिखा था,

 “ये आंसू, मेरे दिल की जुबान हैं; मैं रौऊँ तो रो दें आंसू, मैं हंस दूं तो हंस दें आंसू “,

 उस शायर ने तो आंसुओं को आँखों से ‘टपकी हुई चिंगारी’ भी कहा है और सच ही तो कहा है क्योंकि जब ये आंसू शोले बन कर भड़क उठते हैं तो बड़ी से बड़ी ताकत को हरा देते हैं|

यूं तो, शायरों ने आंसूओं पर इतना लिखा है कि उस पर अलग से किताब लिखनी होगी|                  अब दो चार नमूने देख लीजिये|

साहिर लुधियानवी ने आंसू की कुछ ज़रा आशिकाना अंदाज़ में तारीफ़ की है|

“उन के रुख़्सार पे ढलके हुए आँसू तौबा

मैं ने शबनम को भी शोलों पे मचलते देखा”

 मिर्ज़ा ग़ालिब साहिब तो एक और अंदाज़ में आसूओं का ‘स्वाद’ भी बता रहे हैं, शायद शराब के बजाये आंसू पी बैठे थे|

“तासीर किसी भी दर्द की मीठी नहीं होती ग़ालिब

वजह यह है कि आंसू भी नमकीन होते हैं|”

अब लगे हाथ, जिगर मुरादाबादी की भी सुनते जाईये, जो आंसूओं को हसीन यानी सुन्दर कह रहे हैं|

हसीं तेरी आँखें हसीं तेरे आँसू

यहीं डूब जाने को जी चाहता है|

तो देखा आप ने आंसू कई तरह के होते हैं| आंसू हुसीन और नमकीन भी होते हैं|

अभी हम ने शादी के समय लडकी के आंसूओं की बात तो की ही नहीं| माँ बाप, भाई बहनों से बिछुड़ने का दुःख उस की आँखों से सावन भादों की झाड़ी लगा देता है| बाद में आंसू वह बहाती है या उस के सुसराल वाले, यह बताने की ज़रुरत नहीं है| हालांकि आजकल इस रोने की जगह बॉलीवुड के नाच गानों ने ले ली है जिस में दुल्हन बढ़चढ़ कर हिस्सा लेती है|

आंसू निकलने के और भी कारण होते हैं|

याद होगा आप को स्कूल में टीचर का डंडा! पड़ने से पहले ही आंसू निकल आते थे|

भारत में टीचर के डंडे से भी एक और ख़तरनाक डंडा होता है – पुलिस का, जो आम तौर पर कमज़ोर और ग़रीब लोगों पर पड़ता है|

तो मैं उन आंसूओं की बात नहीं कर रहा जो प्याज़ काटते वक़्त निकलते हैं या फ़िल्मी एक्टरों की आँखों से, ग्लेस्रीन के आंसू, हाँ, दर्शक जिस फिल्म में हीरो या हीरोइन को मरे देखकर खूब रोते हैं|

जब बाहरी चोट लगती है तो भी तो हम पीड़ा से दुखी होकर कराह उठते हैं और आँसू निकल आते हैं| आंसू ज़्यादातर दुःख और रोने से जुड़े हुए हैं| बेबसी के होते हैं, मजबूरी के होते हैं, आमतौर पर मजबूरी में आँसू पीने पड़ते हैं जब आदमी असहाय होता है और कुछ कर नहीं पाता| जब इंसान आँसू पीने पर मजबूर हो जाता है तो उसके नतीजे भयानक निकल सकते हैं क्योंकि वे घुन की तरह अंदर ही अंदर उस इंसान को खाता रहता है| कभी कभी बग़ावत भी कर देता है वह| ग़रीब के आंसुओं की कोई क़दर नहीं जानता उन्हें ऐसे ही बहने दिया जाता है|

आशिक भी हमेशा रोते ही पाए जाते हैं|

रांझे ने हीर की याद में कितने आंसू बहाए, बेचारा जोगी बन गया|

वैसे  आप जानते हैं कि आंसू खुशी के भी होते है, झूठे यानी मगरमच्छ के होते हैं, खून के आंसू भी होते हैं
कहते हैं आँसू ही आदमी को जानवर से अलग करते हैं, पर मैं नहीं मानता | मैं ने तो जानवरों को भी आंसू बहाते देखा है, जब उन पर अत्याचार किया जाता है | यह अलग बात है कि जालिमों को नज़र नहीं आते|

माँ के आंसू जो वह अपने बच्चों को तक़लीफ में देखकर बहाती है, कई बार छिपाती है और कई बार पी भी जाती है | उन की कीमत कया है? वे तो मोतियों की तरह हैं जो एक लड़ी में पिरोने योग्य होते हैं|

वैसे आंसू को माँ के विरुद्ध हथियार के तौर पर तो हम पैदा होते ही इस्तेमाल में लाने लगते हैं| यानी जब भूख लगी, रो दिए और दूध मिल गया| इसी लिए तो कहा गया है, “बिना रोये माँ भी बच्चे को दूध नहीं देती”|

आंसू कमजोरी की निशानी समझी जाती है | आम तौर पर लोग कहते हैं मर्द रोता नहीं है, “क्यों औरतों की तरह आँसू बहा रहे हो?”

लेकिन हालात ने कई बार यह बात गलत साबित की है|

आंसूओं में कितनी ताक़त है, इस की मिसाल आजकल भारत में चल रहे ‘किसान आंदोलन’ से मिलती है, जो 26 जनवरी को कुछ प्रदर्शन-कारियों के लालकिला पर झंडा लहराने, तोड़फोड़ करने और पुलिस कर्मियों को ज़ख़्मी करने के बाद ख़त्म होने जा रहा था| सरकार की ओर से जगह ख़ाली करने को कहा गया था| परंतु उन के एक नेता राकेश टिकैत भावुक हो कर आंसू बहाने लगे और आन्दोलन में नई जान पड़ गई| उन के साथी वापस आने लगे| इस पर एक कहावत याद आ रही है, “जाट मरा तब जानियो, जब तेहरवीं हो ले|”

टिकैत के आंसू पोंछने के लिए सरकार के विरोधी दलों के कई नेता लोग भी पहुँच गये| एक रात में ही पासा पलट गया जिसे टिकैत के आंसूओं का करिश्मा कहा जा रहा है |

राकेश टिकैत रातों रात ‘हीरो’ बन गए|

अब तो कोई नहीं कह रहा कि आदमी रोते नहीं|

अब सरकार, वह कहते हैं ना ‘बैक फुट’ पर आ गई है, अर्थात सरकार घबरा गई है, ऐसा कहा जा रहा है|

कहने का मतलब ये है के आँसू एक बहुत बड़ी ताक़त है|

ये तो केवल एक मिसाल थी|

एक दूसरी मिसाल अभी अभी मिली, जब मैं यह लेख पूरा कर ही चुका था|

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी भी राज्य सभा में भावुक हो कर अश्रू बहाने लगे| मौक़ा था, कोंग्रेस के गुलाम नबी आजाद रिटायर हो रहे थे | 2007 में कश्मीर में आतंकवादियों के द्वारा कई गुजरात के तीरथ यात्री मारे गए थे| गुलाम नबी आज़ाद वहां के चीफ मिनिस्टर थे और नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्य मंत्री | उस समय उन्होंने कैसे सहनशीलता और प्रेमभाव का परिचय देते हुए यात्रियों की सहायता की थी| “वे उन्हें लेकर इस तरह से चिंतित थे जैसे वे उनके परिवार के सदस्य हों, ”मोदी बोले|

गुलाम नबी आज़ाद भी अपने आंसू न रोक सके|

जब मनुष्य भावुक हो जाता है तो कोई चारा नहीं होता है और  मन को शांति देने की कोशिश में आंसू अपने आप ही निकल पड़ते हैं|

हर्ज ही क्या है? यह तो हृदय की कोमलता का सबूत है|

अंत में मैं तो यही कहूंगा, यह सावन-भादों की झड़ी हो या हल्की सी बौछार, इसे रोकने की कोशिश मत करें|

आंसूओं का गिरना कोई बुरी बात नहीं है और न ही कमजोरी|

एक पुराने फ़िल्मी गाने के बोल ज़रा बदल कर, नये अंदाज़ में,

“दिल जलता है मत जलने दे 

आंसू भी बहा फ़र्याद भी कर!”

Short URL: https://indiandownunder.com.au/?p=16031

Posted by on Feb 10 2021. Filed under Bollywood, Community, Featured, Hindi, Humour. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. Both comments and pings are currently closed.

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