लिखूं तो लिखूं क्या ? …संतराम बजाज

कुछ दिनों से बड़ी उलझन सी बनी हुई है, कुछ लिखने को मन ही नहीं कर रहा और न ही कोई टॉपिक दिमाग में आ रहा है| इस करोना ने तो परेशान कर के रख दिया है| ज़िन्दगी रुक सी गई है, कुछ मज़ा ही नहीं है| कुछ नयापन नहीं है, वही चीज़ें, वही जगह, वही चेहरे देख देख कर बोरियत सी होने लगी है|

मैं इसी उलझन में था कि दरवाज़े की घंटी बजी और दर्शन सिंह और मुत्तुस्वामी को खड़े पाया| (आप मेरे इन दोनों मित्रों से मिल चुके हैं)

“आओ, आओ, बहुत अच्छा किया, आप लोग आ गए|”

“क्या लिख रहे थे लेखक महोदय?,” दर्शन सिंह ने चहचहाते हुए पूछा| 

“लिखना क्या है, इसी दुबिधा में पडा हुआ हूँ, दिमाग ब्लैंक हो गया है| अजीब सी सुस्ती और ढीलेपन का आभास होता है,” मैं ने बड़ी बेदिली से उत्तर दिया|

“यार, तुम ठीक कह रहे हो, जीवन एक मशीन की तरह चल रहा है, पर यह ऐसी मशीन है जिसे ज़ंग लग गया हो| वह् जोश और ऊर्जा नहीं दिखती जो सन २०२० से पहले मिलती थी| इस साल को लोग भूल जाना चाहते हैं, परन्तु ऐसा जान पड़ता है कि यह तो २०२१ को भी अपनी लपेट में लेने को उत्सुक है| पता ही नहीं चला कि यह साल कैसे बीत गया,” दर्शन सिंह बोला |

“चारों ओर मास्क के पीछे छिपे हुए चेहरे, जब कभी भी उन की झलक देखने को मिलती है तो उन पर छाई हुई मायूसी और आँखों में निराशा, दिल के अन्दर उठते तूफानों की कहानी बता देती है,” मुत्तुस्वामी की भी ऐसी ही राय थी|

“तुम ठीक कह रहे हो,” मैं ने सहमती जताई| “और साथ में अजीब सा भय – शायद मरने का भय, लोगों के चेहरों पे देखा जा सकता है|”

“अच्छा यह बताओ,” दर्शन सिंह फिर बोला, “क्या आप मिस नहीं करते उन दिनों को, जब दफ्तर से घर आते ही बीवी की तेज़ आवाज़, आप का तरह तरह के सवालों से स्वागत करती थी |

“आप फिर लेट हो गए|” 

“क्यों भूख नहीं है? क्या रास्ते में ही खा कर आये हैं?”

“बॉस से फिर झगडा हो गया क्या? अच्छा तुम फ्रेश हो लो, मैं चाय बनाती हूँ |”

बच्चे भी ‘‘पापा आ गए, पापा आ गए”, कह  कर आप को घेर लेते थे | आप चाहे कितना भी थके हों, यह चहल पहल देख कर रिलैक्स हो जाते थे| परन्तु अब? सारा दिन एक ही सीन –

बीवी से क्या विचारविमर्श करेंगें, ज्यादा करेंगें तो झगडा ही होगा| और अब तुम भी दिल की भड़ास निकालने के लिए वे पहले वाली बेतुकी बातें नहीं कर सकते|

“तुम सारा सारा दिन सहेलियों के साथ घूमती फिरती हो, या किट्टी पार्टियों में बिजी रहती हो, बच्चों को नौकरों पे छोड़ रखा है| फेल नहीं होंगे तो और क्या होगा?” आदि आदि

अब क्या हालत हो गई है, न वह ‘तू, तू — मैं मैं’ और न ही वह तकरार| आप कम्प्युटर पर ऑफिस के काम पर, बीवी टीवी की गोद में या फिर लैपटॉप उसकी गोद में। और बच्चे, वे भी इधर उधर, ऑन लाइन ट्यूशन ले रहे हैं| स्ट्रेस और टेंशन| कोई भी ऊंची आवाज़ में घर बात नहीं कर सकता, क्योंकि आफिस से काल आई है| अब ऐसे में, क्या घुटन महसूस नहीं होगी?”

“पर यार दर्शन सिंह, कुछ फायदे भी तो हैं,” मुत्तुस्वामी ने टोकते हुए कहा, ”जैसे, सुबह सुबह उठ कर अब दफ्तर की जल्दी नहीं होती, बसों की लाइनों में खड़े नहीं होना पड़ता, कपडे भी जैसे हैं पहन लिए| पहले की तरह सूट, टाई और मैचिंग शर्ट? बीवी भी नई नई साड़ियों का तकाज़ा नहीं करती| और मुझे अपने वैजी गार्डन में काम करने का और समय मिल जाता है| भई मैं तो खुश हूँ, घर से काम कर के| और तो और, मेरे आफिस वाले भी बड़े खुश हैं| उन के खर्चे जो बच रहे हैं|”

“एक बीच का रास्ता भी तो हो सकता है,” मैं ने सुझाव दिया, ”अर्थात तीन दिन आफिस ४ दिन घर (२ दिन काम के, २ दिन परिवार के साथ आराम के) | स्टाफ का रोस्टर बना कर दिन निर्धारित किये जा सकते हैं| इस में दोनों का फायदा है| अपने साथियों से मिलकर विचार विमर्श  यानी socialising भी हो जायेगी और दिमागी संतुलन भी बना रहेगा| मेरी कुछ लोगों से बात भी हुई है और वे भी ऐसा ही चाहते हैं| एम्प्लायर के दफ्तर का किराया, बिजली पानी, कर्मचारियों की देखभाल, इंशोरेंस आदि आदि, ऐसे और बहुत से खर्चे बचेंगें” |                               

“अब यही होने वाला है,” दर्शन सिंह बड़ी बेदिली से बोला |

और फिर अचानक ही जोश में आकर कहने लगा, “तुम लिखने की बात कर रहे थे ना, लो याद आया, तुम मीघन और हैरी पर लिख डालो, बड़ी धमाकेदार बातें कही हैं उन्होंने उस ओपरा के इंटरव्यू में|”

“यार, वो ठीक है, मैं ने लिखा था एक साल पहले भी, जब वो महल छोड़ कर जा रहे थे, ‘चल उड़ जा रे पंछी’ – महारानी के साथ उन की कोई समस्या नहीं थी, वह तो देवरानी और जेठानी में कुछ चल रहा था| पर अब मामला कुछ गंभीर है, कुछ और बातें सामने आई है, जो उस समय आने वाले बच्चे के रंग के बारे में हैं | ऐसी बातें सुनकर कौन माँ दुखी नहीं होगी? वह तो अपनी जान लेने की बात भी सोच रही थी| तो, भैया ये सफ़ेद रंग के लोग अभी भी अपने आप को सुपीरियर ही समझते हैं, तो इस पर क्या लिखें|”

“अच्छा, टीकाकरण भी आज का टॉपिक है|”

“ठीक कहा, यहाँ भी ‘जिस की लाठी उस की भैंस’ वाला मामला है| जिन देशों के पास पैसा नहीं है और न ही टीका बनाने के साधन हैं, वे बेचारे आसमान की ओर देख रहे हैं|

अब देखिये, इंसानी फितरत! इटली ने आस्ट्रेलिया आने वाले टीके की सप्लाई पर रोक लगा दी है क्योंकि उन्हें अपने देशवासियों के लिए इस की आवश्यकता है| फ़्रांस ने भी सुना है, इटली की इस बात को ठीक माना है| अब देखिये, भारत की ओर… भारत ने अपने पड़ोसी कई देशों को, जैसे श्रीलंका, बंगलादेश, आफ्गानिस्तान आदि को इस टीके की बिना कुछ पैसा लिए उपलब्धि की है| ब्राजील के प्रेजिडेंट और केनेडा के प्रधान मंत्री द्वारा भारत से टीके के लिए अपील करने पर भारत ने टीका सप्लाई किया है| WHO के प्रधान ने भी भारत की सराहना की है| यह महामारी बाहर से आई है और फिर भी आ सकती है, इसलिए दूसरों को भी टीकाकरण से वंचित करने पर आप पूरी तरह से बच नहीं पायेंगे|”

“अरे भई, चाय वाये पीयें, ये बातें तो होती रहेंगीं, ”मुत्तुस्वामी ने याद दिलाया|

“हाँ, चलो आओ, साथ साथ आज की ताज़ा हिन्दुस्तान की खबरें भी देख लेते हैं|”

पर दर्शन सिंह को मेरी यह सलाह कुछ ख़ास जची नहीं|

“छोड़ो यार! ये टीवी वाले झगड़ते ज्यादा हैं और खबरें कम देते हैं| दो धड़ों में बटे हुए हैं| ’गोदी मीडिया’ अर्थात मोदी मीडिया’| उन के लिए तो, मोदी जी भगवान् का रुप हैं और वे भारत का उद्धार करने के लिए आये हैं इस धरती पर| वे कोई गलती कर ही नहीं सकते| ७० साल से चल रही समस्याओं का हल निकाल रहे हैं| अयोध्या में मंदिर, कश्मीर में 370, तीन तलाक़ और अब किसानों की कमाई दुगनी जैसी, कुछ एक मिसालें देते हैं वे लोग|

अब दूसरे धड़े की बात करें, तो वे हैं ‘रोदी‘ मीडिया, अर्थात वे हर बात पे रोते और शोर मचाते रहेंगे| मोदी नाम से उन को एलर्जी है| उन का हीरो है राहुल गांधी |

जब तक वे मोदी को दोचार सुना न दें, उन का खाना हज़म नहीं होता| मोदी के साथ उन्हों ने दो ‘राहु-केतु’ भी जोड़े हुए हैं और वे हैं ‘अडानी और अम्बानी’|

“तुम उस के ‘चाणक्य’ अर्थात अमित शाह को तो भूल ही गए,” मुत्तुस्वामी ने याद दिलाया| 

“हाँ, वह राहुल तो कहता रहता है, ”हम दो, हमारे दो” –  ऐसा लगता है कि मोदी को भी इन लोगों को सताने और जलाने में मज़ा आता है| उस की ताज़ा मिसाल है, अहमदाबाद का नया क्रिकेट स्टेडियम?,” जो सरदार पटेल के नाम पर था, वही पटेल जिस का सब से ऊंचा बुत बना कर उसे श्रधांजलि दी और अब उस के नाम के स्टेडियम को अपने नाम कर लिया| और तो और, उन दोनों राहु, केतू के नाम पर पिच के दो सिरे कर दिए – ’अडानी एंड’ और ‘रिलायंस एंड’| भला कोई बात हुई? है तो यह धांधलेबाजी, या फिर ताकत का नशा, ” दर्शन सिंह बोले जा रहा था, “आ बैल मुझे मार” खुले आम चुनौती है|”

“बस करो दर्शनसिंह,” मुत्तुस्वामी ने उसे रोका |

“हम क्यों अपना ब्लड प्रेशर बढ़ा रहे हैं, मोदी का धन्यवाद करें कि करोना के टीके तो मिल जायेंगे, क्योंकि इटली ने तो हमारी सप्लाई ही बंद करवा दी है| पता नहीं हमारी बारी कब आयेगी? अमेरिका में तो हमारे बच्चों की आयु के लोगों को भी टीके लग चुके हैं| आओ, कुछ खा पीकर दिमाग को तरोताजा करें,” मैं ने हँसते हुए कहा |

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Posted by on Mar 11 2021. Filed under Community, Featured, Hindi, Sport. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. Both comments and pings are currently closed.

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