चमचे और कड़छियाँ … संत राम बजाज

आज सुबह सुबह नुक्सान हो गया| एक कीमती चाय का प्याला टूट गया| जैसे ही मैं ने उबलता हुआ पानी उस में डाला वह क्रैक हो गया| मूड थोड़ा ऑफ हो गया|

उधर फोन की घंटी बजकर बंद हो गई और दुबारा बजने लगी| मैं ने फोन उठाया| दर्शन सिंह की आवाज़ थी|

“यार, तुम फोन क्यों नहीं उठाते?”

“उठाया तो है| क्यों सुबह सुबह दिमाग चाट रहे हो,” मैं ने झल्ला कर उत्तर दिया|

“क्या हुआ बड़े भाई? बड़े उखड़े उखड़े बोल रहे हो|”

मैंने उसे अपने फेवरिट और कीमती प्याला टूटने की बात बताई|

“उस में एक चमचा रख देता तो सारी हीट वह खींच लेता और प्याला सही सलामत रहता|”

“यही तो गलती हो गई|”

“एक प्याला ही तो था और ले आना|”

“अरे, पूरा सेट ख़राब हो गया| ऐसे सेट आजकल मिलते कहाँ है?”

“अच्छा, मैं आ रहा हूँ, गपशप लगायेंगे| मुत्तु को भी लेता आऊँगा|”, दर्शन सिंह ने फोन रख दिया|

“वास्तव में चमचा बड़े काम की चीज़ है|” दर्शन सिंह ने आते ही भाषण शुरू कर दिया, “हम चमचा क्यों इस्तेमाल करते हैं? ताकि खाते वक्त, हाथ गंदे न हों| गर्म और ठंडी चीज़ से हाथ को तकलीफ न पहुंचे| इसी लिए वे खाने के हर टेबल पर होते हैं|

परन्तु ‘चमचा’ शब्द बदनाम हो कर रह गया है| यह एक ‘टाइटल’ की तरह उन लोगों के लिए इस्तेमाल में लाया जाता है, जो दूसरों को मस्का मारते हैं, या buttering करते हैं, यानी आम भाषा में जो दूसरों की चापलूसी करते हैं, उन्हें चमचा कहा जाता है। 

बेशक, इस नाम का दुरूपयोग हो रहा है, लेकिन यह इंसानी ‘चमचा’ समाज का एक बहुत ही आवश्यक अंग है, इस के बिना कई बड़े बड़े काम रुक सकते हैं| या फिर उसके द्वारा कई काम हो भी जाते हैं। बशर्ते अगर आप उसकी गुड बुक्स में हों।  

यह प्राणी हर देश में पाया जाता है| रंग, भेदभाव अलग हो सकते हैं, पर काम करने का तरीका करीब करीब एक ही होता है| काम भी एक ही है| अपने मतलब के लिए कुछ भी करेगा |

“इसी लिए तो इन लोगों को चमचा नाम दिया गया है क्योंकि यह भी आम चमचे की भाँती अपने स्वामी का हाथ गंदा नहीं होने देते , सारी गर्मी अपने में समा लेते हैं और मालिक पर आंच नहीं आने देते ,” मुत्तुस्वामी ने  व्याख्या की|

“चमचे भी कई प्रकार के होते हैं,” दर्शन सिंह बोला, “छोटे छोटे कामों के लिए जैसे ‘टी स्पून, या टेबल स्पून| जहाँ दो छोटे  चमच मिर्ची डालनी हो यदि वहां दो  टेबल स्पून डाल दी तो जलन तो हो गी ना! इसलिए बड़े सर्विंग स्पून और उस से बड़ा चमच अर्थात कड़छी, बड़े कामों के लिए इस्तेमाल होती है।  जैसे  चमचे कई धातुओं के मिलते हैं – सोने के, गोल्ड प्लेटेड, चांदी के, लोहे और स्टील के, लकड़ी के, प्लास्टिक के ‘सिंगल यूज़’ वाले उसी प्रकार ये इंसानी चमचे भी हर स्टाइल में होते हैं| एक बार वाले या  बार बार इस्तेमाल में लाने वाले पक्के|

आप को याद है जब सड़क के किनारे खडा छोले भठूरे वाला या चाट वाला  ढाक के पत्ते का डूना बना कर देता था तो साथ में एक छोटा सा उसी पत्ते का पीस भी देता था जो चमच के तौर पर इस्तेमाल में लाया जाता था; यूज़ किया और फैंक दिया | वैसे वह प्लास्टिक के बनिस्पत अच्छा होता था क्योंकि वह पर्यावरण को दूषित नहीं करता था, थोड़े समय बाद धरती में घुलमिल जाता था |

“खैर, हम तो इंसानी चमचों की चर्चा करने जा रहे हैं| चलते हैं, उन ख़ास चमचों की ओर, जो बड़े बड़े सिआसी लीडरों के पास होते हैं| उन दोनों का चोलीदामन का साथ होता है| खासतौर पर पॉलिटिशियन तो चमचों के बिना घर से बाहर कदम तक नहीं रख सकते| उस के आगे पीछे चमचों की एक बारात सी चल रही होती है| कितने चमचे हैं, देख कर उस की साख और पोजीशन का पता लगाया जाता है|

ये चमचे कदम कदम पर झुक झुक कर उस के पांव को हाथ लगाते रहते हैं| माना कि भारत में अपने से बड़ों को आदर के तौर पर झुक कर पाँव को हाथ लगाते है, पर यहाँ तो, बुज़ुर्ग लोग भी अपने से काफी छोटी उमर के नेता को इतना झुकर प्रणाम करते हैं कि बाद में कई दिन कमर की मालिश करवाते रहते हैं |

“वैसे, सच बोलें तो हम सब किसी न किसी के चमचे हैं,” दर्शन सिंह बोला, “बीवी को नया जेवर लेना हो तो वह चमची मारती है , ऑफिस में साहिब की थोड़ी बहुत चमचागिरी तो सब करते हैं| हाँ, पॉलिटिक्स में कुछ ज़्यादा ही चलता है,क्योंकि वहां फायदे भी तो बहुत हैं| वे चमचे बड़े ‘धाँसू’ होते हैं|

पंजाबी में एक कहावत है, “चोर नालों पंड काहली,” दर्शन सिंह बोला|

“क्या मतलब है, इस का?” मुत्तुस्वामी ने पूछा|

“इस का मतलब है कि ‘मुद्दई सुस्त,गवाह चुस्त’”

“अरे भई, सीधे सीधे शब्दों में नहीं बता सकते?” मुत्तुस्वामी की कुछ समझ में नहीं आया|

“मतलब यह कि चमचा अपने बॉस की बेफकूफी वाली या गलत बात को सही साबित करने में उस से भी ज़्यादा होश्यारी दिखाता है| ये स्पेसिलिस्ट चमचे आजकल टीवी डिबेट्स में बड़े  नज़र आते हैं|बहुत सारे  टीवी एंकर भी आजकल यह काम कर रहे हैं|”

“वैसे तो चमचागिरी बहुत पुरानी है, पर मुगलों और अंग्रेज़ी राज के ज़माने में इस ने काफी जोर पकड़ा|लेकिन हमारे आजकल के नेताओं  के इन चमचों ने तो उस कल्चर को  एक आर्ट फॉर्म में बना दिया है|”

“चमचागिरी, कोई इतना आसन काम भी नहीं है, यह हर एक के बस का रोग नहीं है,” मैं ने भी अपनी सलाह दी |

“केवल झूठी मूठी तारीफ़ को चमचागिरी नहीं कहते, ‘खानदानी’ चमचे झूठी तारीफों के साथ साथ उन के घर के छोटे बड़े काम करने, जैसे बच्चों को स्कूल लेजाना, या घर की मैडम के लिए बाज़ार से साग सब्ज़ी लाना या साहिब के कुत्ते को ‘वाक’ पर ले जाना, भी करते रहते हैं|”

चमचागिरी ढंग से और दिमाग से की जाए तो इनाम भी बड़े मिलते हैं| उन के बच्चों को अच्छे स्कूल में एडमिशन, सरकारी कोटे से plot या क्वार्टर या फिर पेट्रोल स्टेशन का लाइसेंस और ऊंची पदवी या अच्छी नौकरी  आदि आदि|

हिन्दुस्तानी सियासत तो चमचों से भरी पडी है| बड़े बड़े नाम आते हैं| किस किस का नाम लें, कुछ एक सैम्पल ही काफी होंगे|

ज्ञानी ज़ैल सिंह, १९८२ में इन्द्रा गांधी द्वारा भारत के राष्ट्रपति बनाए गए | वे केवल नाम के ज्ञानी नहीं थे, उन्हें इस बात का पूरा ज्ञान था कि ‘चूना’ किसे लगाना है और ‘मस्का’ किसे| उस समय उन्होंने कहा था कि यदि प्रधानमंत्री इन्द्रा गांधी, उन्हें झाडू लगाने को कहेंगी तो वह खुशी खुशी वो भी कर देंगे|”

“यार! उस का नाम न लो, नाक कटवा कर रख दी उस ने,” दर्शन सिंह ने मुझे टोका|

“क्यों, क्या वह तुम्हारे गाँव का था?” मुत्तुस्वामी ने उतेज्जित हो पूछा|

“नहीं भाई गाँव का तो नहीं था, पर पंजाबी तो था|”

“तो क्या पंजाब में चमचे नहीं होते?” मुत्तुस्वामी फिर बोला|

 “अरे तुम्हारे, साउथ में तो भरे पड़े हैं, वह जो अम्मा अर्थात जयललिता के पाँव छूते थे बड़े बड़े लीडर तक भी |”

“मेरा मुंह मत खुलवाओ तुम्हारे यहाँ कई फिरते हैं, पार्टी बदलते हैं, फिर तलवे चाटते फिरते हैं|”

मैं ने दोनों को चुप रहने को कहा और अपनी बात जारी रखी

“साउथ-नार्थ की बात नहीं हैं, सब जगह यही हाल है| मायावती के जूते तक उठाये फिरते थे लोग| और बंगाल में ममता बनर्जी के आगे झुक झुक कर मंत्री तक यही करते हैं| और आजकल मोदी जी और अमित शाह को खुश करने वालों की भी कमी नहीं है| गिनना मुश्किल होगा | कई तो उन्हें भारत के लिए भगवान् का दिया उपहार मानते हैं|

चमचे आमतौर पर खुलकर सामने नहीं आते और इस बात से भी इनकार करते हैं कि वे किसी के चमचे हैं| फिर भी कई इस में शान दिखाते हैं| ऐसे ही कुछ समय पहले फ़िल्मी कलाकार अनुपम खेर ने कहा था कि वह मोदी जी का चमचा कहलवाने में गर्व करेंगे|

संजय गांधी को तो चमचे इकठे करने में मज़ा आता था| मशहूर लेखक खुशवंत सिंह का नाम भी उन में शामिल था, जबकि नारायणदत तिवारी जैसे बुज़ुर्ग नेता तो उन के जूते तक उठाते पाए गए थे|

कांग्रेस पार्टी का राज, क्योंकि बहुत समय तक रहा है, इसलिए उन के चमचे भी बहुत रहे हैं, और अभी भी सोनिया और राहुल के आगे पीछे ढेरों मिलेंगे|”

“और वह कड़छी क्या होता है?” मुत्तुस्वामी ने और कुरेदा|

“यदि कड़छी की बात की जाए तो कड़छी चमच से बहुत बड़ी होती है और उस में कई चमचे समा जाते हैं| यानीं चमचों के भी चमचे होते हैं | लेकिन इन चमचों की भीड़ में पता ही नहीं चलता कि कौन किस का चमचा है|

राजकपूर की फिल्म का तीतर वाला गाना याद है ना! बस तीतर हटा कर चमचा लगा दो|

“चमचे के इक आगे चमचा, चमचे के इक पीछे चमचा,

आगे चमचा, पीछे चमचा, बोलो कितने चमचे|”

यानी कड़छी को आप ‘चमचा इंचार्ज’ कह सकते हैं, इस में ‘सौ सुनार की, एक लुहार की’ वाली बात होती है| आप इसे ‘ब्रह्मास्त्र’ कह सकते हैं| यह ख़ास ख़ास और मुश्किल समय पर इस्तेमाल की जाती है|

एक सब से बड़ा रिस्क जो एक चमचे को उठाना पड़ सकता है कि कभी कभी इन्हें क़ुर्बानी का बकरा बना दिया जाता है ताकि साहिब की जान बचाई जा सके| लेकिन इस में इनाम भी काफी बड़ा मिलता है यदि बॉस बच गया तो फिर वारे न्यारे हैं| आजकल महाराष्ट्र में, ‘वसूली काण्ड’ इस की ताज़ा मिसाल है| देखा आप ने, बैंकों में शायद नोट गिनने की मशीन हो न हो,ले किन ये मंत्री के चमचे कार में लिए घुमते थे| पैसा और सरकारी पदवियां पाने की होड़ में ये लोग कई हदें पार कर जाते हैं और रास्ते में कई हकदार लोगों की लाशों के ऊपर से लाँघ जाते हैं|”

कुछ चमचे ‘फ्री लांस’ होते हैं, यानी जहाँ काम पड़ा वहीं पहुँच गए| ख़ास तौर पर ऐसे चमचे मुफ्त के खाने, VIPs के साथ फोटो खिचवाने के लिए सरकारी फंक्शनों में मिलेंगे| बस एक बार साहिब को खुश कर लिया तो फिर लिस्ट में नाम और हर पार्टी में न्योता पक्का| काफी बेशर्म किस्म के होते हैं ये मुफतखोर चमचे|

आमतौर पर ये ‘हार्मलेस’ होते हैं, जी हजूरी अच्छी कर लेते हैं | थाली के बैंगन की तरह इधर से उधर लुड्खने में माहिर होते हैं यानी बेपैन्दे के लोटे की तरह होते हैं|”

मुत्तुस्वामी ने फिर पूछा, “वह बॉलीवुड के चमचों के बारे में लेटिस्ट क्या है, दर्शन सिंह ?”

“आजकल कर्ण जोहर, सलमान खान, आदित्य चोपड़ा, महेश भट्ट के आगे पीछे, चमचों की भीड़ बताई जाती है, ऐसा कंगना रानौत का मानना है, या फिर अनुपम खेर से पूछ लीजिये|

लोग खुलमखुल्ला कह रहे हैं, “करो BJP की चमचागिरी, मिलेगा तुम को पद्मश्री,” दर्शन सिंह ने उत्तर दिया|

दर्शन सिंह भी उकता गया था, शरारत भरी नज़रों से मुत्तुस्वामी की ओर देख कर बोला, “घबराईये नहीं, ये चमचे जाएंगें, नये चमचे आयेंगे, और यह चमचागिरी का बिजनेस चलता रहेगा| तुम्हें ट्राई करना हो, तो शौक़ से, बड़ा स्कोप है!”

और इस से पहले कि मुत्तुस्मामी  रियेक्ट करे, मैं ने चाय का प्याला उस के सामने रखते हुए पूछा, ”चीनी कितने चमचे ?”                

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Posted by on Apr 10 2021. Filed under Community, Featured, Hindi, Humour. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. Both comments and pings are currently closed.

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